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जुनूँ की इब्तिदा तो है, जुनूँ की इंतिहा नहीं — ओवैस उनीस की एहतिजाजी शायरी

اُوَیسؔ احمد ہفتہ، 6 جون 2026
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जुनूँ की इब्तिदा तो है, जुनूँ की इंतिहा नहीं
मर्ज़ ये लाइलाज है, जुनूँ की दवा नहीं
सुकूत की है ये सज़ा, मगर तुझे पता नहीं
सुकूत अपना तोड़, आ! अभी भी कुछ हुआ नहीं
तसल्लीयाँ, ये थपकियाँ हमें तो यूँ न दो मियाँ
मक़ाम-ए-इंतिक़ाम है, ये चश्मपोशी का नहीं
है ज़ुल्म बरपा हर तरफ़, ये तेरी अपनी क़ौम पर
वो आह-ओ-नाले, शोर-ओ-ग़ुल कि तूने कुछ सुना नहीं
जो ज़ालिमों के ज़ुल्म से तड़प-तड़प के रह गईं
वो बस्तियाँ, वो बेख़ता, कहीं भी कुछ बचा नहीं
मुज़ाहमत में इज़्ज़तें हैं, रिफ़अतें, बुलंदियाँ
फ़रार की न राह लो, फ़रार में शिफ़ा नहीं
📖 सार

यह कलाम ज़ुल्म, जब्र, बे-हिसी और इज्तिमाई ख़ामोशी के ख़िलाफ़ एक पुरजोश एहतिजाज है। शायर ने जुनूँ को ऐसी फ़िक्री और अमली ताक़त के रूप में पेश किया है जो नाइंसाफ़ी के सामने झुकने के बजाय मुकाबले और मज़ाहमत का हौसला पैदा करती है। अशआर में मज़लूम बस्तियों की तबाही और क़ौम की बेबसी को असरदार अंदाज़ में बयान किया गया है।

📚 साहित्यिक समीक्षा

इस कलाम में एहतिजाजी लहजा, फ़िक्री शिद्दत और समाजी दर्द नुमायाँ है। शायर ने जुनूँ, सुकूत, इंतिक़ाम, आह-ओ-नाले, मज़ाहमत और फ़रार जैसे अल्फ़ाज़ से ऐसा म…

इस कलाम में एहतिजाजी लहजा, फ़िक्री शिद्दत और समाजी दर्द नुमायाँ है। शायर ने जुनूँ, सुकूत, इंतिक़ाम, आह-ओ-नाले, मज़ाहमत और फ़रार जैसे अल्फ़ाज़ से ऐसा माहौल बनाया है जिसमें ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत महसूस होती है। ज़बान सीधी और असरदार है।

🖋️ आलोचनात्मक समीक्षा

नज़्म की फ़िक्री ताक़त उसके सवालिया और ललकारने वाले अंदाज़ में छिपी है। शायर ख़ामोशी को सज़ा और फ़रार को बेफ़ायदा बताकर इज्तिमाई ज़मीर को झिंझोड़ता है…

नज़्म की फ़िक्री ताक़त उसके सवालिया और ललकारने वाले अंदाज़ में छिपी है। शायर ख़ामोशी को सज़ा और फ़रार को बेफ़ायदा बताकर इज्तिमाई ज़मीर को झिंझोड़ता है। आख़िरी शेर में मज़ाहमत को इज़्ज़त और बुलंदी से जोड़ना इसका अहम फ़िक्री पहलू है। कुछ जगहों पर लफ़्ज़ों की तरतीब और फ़न की तराश से असर को और बढ़ाया जा सकता है।

✦ केंद्रीय विचार

इस नज़्म का बुनियादी ख़याल ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बेदारी और मज़ाहमत है। शायर क़ौम को याद दिलाता है कि जब बेगुनाह इंसानों पर ज़ुल्म हो रहा हो और बस्तियाँ उज…

इस नज़्म का बुनियादी ख़याल ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बेदारी और मज़ाहमत है। शायर क़ौम को याद दिलाता है कि जब बेगुनाह इंसानों पर ज़ुल्म हो रहा हो और बस्तियाँ उजड़ रही हों तो ख़ामोश रहना भी बे-हिसी की एक शक्ल है। वह खोखली तसल्ली के बजाय अमली क़दम उठाने और हक़ की आवाज़ बुलंद करने पर ज़ोर देता है।

✦ शेर-दर-शेर व्याख्या

जुनूँ की इब्तिदा तो है, जुनूँ की इंतिहा नहीं
मर्ज़ ये लाइलाज है, जुनूँ की दवा नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: जुनूँ: दीवानगी और बेपनाह जज़्बा, इंतिहा: आख़िरी…

जुनूँ की इब्तिदा तो है, जुनूँ की इंतिहा नहीं
मर्ज़ ये लाइलाज है, जुनूँ की दवा नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: जुनूँ: दीवानगी और बेपनाह जज़्बा, इंतिहा: आख़िरी हद, मर्ज़-ए-लाइलाज: ऐसा रोग जिसका इलाज मुमकिन न हो।
तशरीह:
शायर इस शेर में जुनूँ को ऐसे जज़्बे के तौर पर पेश करता है जिसकी कोई आख़िरी हद नहीं। यह जुनूँ केवल दीवानगी नहीं बल्कि हक़ के लिए जद्दोजहद और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने की ताक़त का इस्तिआरा भी है। शायर कहता है कि इस जज़्बे की शुरुआत तो हो सकती है, मगर इसकी इंतिहा तय नहीं की जा सकती। यह ऐसा लाइलाज मर्ज़ है जिसकी कोई दवा नहीं, क्योंकि सच्चा जुनूँ किसी डर या मसलहत के सामने ख़त्म नहीं होता।
मरकज़ी मफ़हूम:
हक़ और मक़सद के लिए पैदा होने वाला जुनूँ ऐसा जज़्बा है जो कभी ख़त्म नहीं होता और जिसे कोई ताक़त दबा नहीं सकती।
सुकूत की है ये सज़ा, मगर तुझे पता नहीं
सुकूत अपना तोड़, आ! अभी भी कुछ हुआ नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: सुकूत: ख़ामोशी, सज़ा: अज़ाब या नुक़सान, पता: ख़बर, सुकूत तोड़ना: ख़ामोशी ख़त्म करके आवाज़ उठाना।
तशरीह:
शायर मुख़ातब को आगाह करता है कि ज़ुल्म के माहौल में ख़ामोश रहना भी एक बड़ी सज़ा बन सकता है। जब समाज में नाइंसाफ़ी हो रही हो और मज़लूम मदद के इंतज़ार में हों तो ख़ामोशी हालात को और बिगाड़ देती है। शायर हौसला देते हुए कहता है कि अभी वक़्त हाथ से नहीं निकला, इसलिए ख़ामोशी तोड़ो और अपने हिस्से की आवाज़ बुलंद करो।
मरकज़ी मफ़हूम:
ज़ुल्म के सामने ख़ामोश रहना नुक़सानदेह है; इसलिए वक़्त रहते हक़ की आवाज़ उठानी चाहिए।
तसल्लीयाँ, ये थपकियाँ हमें तो यूँ न दो मियाँ
मक़ाम-ए-इंतिक़ाम है ये चश्मपोशी का नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: तसल्लीयाँ: दिलासा, थपकियाँ: बहलाने के लिए प्यार से हाथ फेरना, मक़ाम-ए-इंतिक़ाम: बदला लेने या हिसाब माँगने का मौक़ा, चश्मपोशी: जान-बूझकर नज़रअंदाज़ करना।
तशरीह:
इस शेर में शायर खोखली तसल्ली और वक़्ती दिलासों पर एतराज़ करता है। वह कहता है कि जब ज़ुल्म हद से बढ़ चुका हो और मज़लूम इंसाफ़ के इंतज़ार में हों तो उन्हें सिर्फ़ दिलासा देकर ख़ामोश नहीं कराया जा सकता। यह वक़्त हक़ीक़त से आँखें चुराने का नहीं बल्कि ज़ुल्म का हिसाब माँगने और इंसाफ़ के लिए मज़बूत मौक़िफ़ अपनाने का है। यहाँ इंतिक़ाम का मतलब ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जवाबदेही और इंसाफ़ का मुतालबा है।
मरकज़ी मफ़हूम:
ज़ुल्म के मुक़ाबले में खोखली तसल्ली नहीं, बल्कि इंसाफ़, जवाबदेही और अमली क़दम ज़रूरी हैं।
है ज़ुल्म बरपा हर तरफ़, ये तेरी अपनी क़ौम पर
वो आह-ओ-नाले, शोर-ओ-ग़ुल कि तूने कुछ सुना नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: ज़ुल्म बरपा: ज़ुल्म का फैला होना, आह-ओ-नाले: दर्द भरी फ़रियादें, शोर-ओ-ग़ुल: चीख़-पुकार, क़ौम: एक सामूहिक समूह।
तशरीह:
शायर मुख़ातब के ज़मीर को झिंझोड़ते हुए कहता है कि ज़ुल्म किसी अजनबी पर नहीं बल्कि तेरी अपनी क़ौम पर हो रहा है। हर तरफ़ मज़लूमों की आहें, फ़रियादें और चीख़-पुकार सुनाई दे रही हैं, मगर मुख़ातब ऐसा बे-हिस बन गया है जैसे उसे कुछ सुनाई ही नहीं देता। शायर इस रवैये पर अफ़सोस करता है कि अपने लोगों की तकलीफ़ भी इंसान को बेदार न कर सके तो यह इज्तिमाई बे-हिसी की इंतिहा है।
मरकज़ी मफ़हूम:
अपनी क़ौम के मज़लूम लोगों की फ़रियाद से बेख़बर रहना बे-हिसी है; उनका दर्द महसूस करना और उनका साथ देना ज़रूरी है।
जो ज़ालिमों के ज़ुल्म से तड़प-तड़प के रह गईं
वो बस्तियाँ, वो बेख़ता, कहीं भी कुछ बचा नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: ज़ालिम: ज़ुल्म करने वाला, तड़पना: सख़्त तकलीफ़ में होना, बस्तियाँ: आबाद इलाक़े, बेख़ता: बेगुनाह, बाक़ी: बचा हुआ।
तशरीह:
इस शेर में शायर ज़ुल्म और जब्र के नतीजे में तबाह होने वाली बस्तियों और बेगुनाह इंसानों की दर्दनाक तस्वीर पेश करता है। वह उन लोगों का ज़िक्र करता है जो ज़ालिमों के ज़ुल्म से तड़पते रहे और जिनकी ज़िंदगियाँ, घर और ख़्वाब बर्बाद हो गए। शायर के अल्फ़ाज़ में गहरा इंसानी दर्द महसूस होता है। यह केवल इमारतों की तबाही का बयान नहीं बल्कि मासूम लोगों की बर्बाद होती ज़िंदगी का नौहा है।
मरकज़ी मफ़हूम:
ज़ुल्म की सबसे बड़ी क़ीमत बेगुनाह इंसान चुकाते हैं; उनकी तबाही पूरी इंसानियत के लिए एक दर्दनाक अलमिया है।
मुज़ाहमत में इज़्ज़तें हैं, रिफ़अतें, बुलंदियाँ
फ़रार की न राह लो, फ़रार में शिफ़ा नहीं
मुश्किल अल्फ़ाज़: मुज़ाहमत: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट जाना, इज़्ज़त: वक़ार और एहतराम, रिफ़अतें: बुलंद मर्तबे, फ़रार: भाग जाना, शिफ़ा: इलाज और निजात।
तशरीह:
इस शेर में शायर अपने कलाम का बुनियादी पैग़ाम पूरी ताक़त से पेश करता है। वह कहता है कि इज़्ज़त, वक़ार और बुलंदी का रास्ता मुज़ाहमत से होकर गुज़रता है। ज़ुल्म के सामने हथियार डाल देना या हालात से भाग जाना किसी मसले का स्थायी हल नहीं है। शायर मुख़ातब को हौसला देता है कि वह डर और मसलहत से निकलकर हक़ और इंसाफ़ के लिए साबित-क़दम रहे। यहाँ मुज़ाहमत से मुराद ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उसूली और पुरअमन जद्दोजहद भी है।
मरकज़ी मफ़हूम:
इज़्ज़त और सरबुलंदी ज़ुल्म के सामने डटने में है; फ़रार मसाइल का इलाज नहीं।

✦ कलात्मक ख़ूबियाँ

कलाम में तकरार, तज़ाद, सवालिया अंदाज़, ख़िताबी लहजा और जज़्बाती आहंग मौजूद हैं। जुनूँ और उसकी इंतिहा, सुकूत और आवाज़, मज़ाहमत और फ़रार का तज़ाद नज़्म …

कलाम में तकरार, तज़ाद, सवालिया अंदाज़, ख़िताबी लहजा और जज़्बाती आहंग मौजूद हैं। जुनूँ और उसकी इंतिहा, सुकूत और आवाज़, मज़ाहमत और फ़रार का तज़ाद नज़्म के पैग़ाम को मज़बूत बनाता है।

✦ प्रतीकवाद

जुनूँ अज़्म और हौसले की अलामत है। सुकूत इज्तिमाई बे-हिसी और मसलहत-पसंदी को ज़ाहिर करता है। उजड़ी हुई बस्तियाँ ज़ुल्म के इंसानी नतीजों की अलामत हैं, जब…

जुनूँ अज़्म और हौसले की अलामत है। सुकूत इज्तिमाई बे-हिसी और मसलहत-पसंदी को ज़ाहिर करता है। उजड़ी हुई बस्तियाँ ज़ुल्म के इंसानी नतीजों की अलामत हैं, जबकि मज़ाहमत ख़ुद्दारी और हक़ के लिए खड़े होने का इस्तिआरा है।

✦ रूपक और उपमाएँ

“मर्ज़-ए-लाइलाज” एक ऐसी इज्तिमाई हालत का इस्तिआरा है जिसमें जुनूँ और मज़ाहमत के जज़्बे को ख़त्म नहीं किया जा सकता। “सुकूत की सज़ा” ख़ामोशी के नुक़सान …

“मर्ज़-ए-लाइलाज” एक ऐसी इज्तिमाई हालत का इस्तिआरा है जिसमें जुनूँ और मज़ाहमत के जज़्बे को ख़त्म नहीं किया जा सकता। “सुकूत की सज़ा” ख़ामोशी के नुक़सान को दिखाती है। “आह-ओ-नाले” मज़लूमों के दर्द की अलामत हैं और “फ़रार में शिफ़ा नहीं” मुश्किलात से मुँह मोड़ने की बेफ़ायदा कोशिश को ज़ाहिर करता है।

✦ शायर के वैचारिक आयाम

ओवैस उनीस के फ़िक्री ज़ाविये में ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना, मज़लूमों के साथ खड़ा होना, इज्तिमाई ज़िम्मेदारी और हक़ के लिए जद्दोजहद अहम हैं। शायर क…

ओवैस उनीस के फ़िक्री ज़ाविये में ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना, मज़लूमों के साथ खड़ा होना, इज्तिमाई ज़िम्मेदारी और हक़ के लिए जद्दोजहद अहम हैं। शायर क़ौम को ख़ामोशी और बे-अमली से निकलने की दावत देता है।

✦ आज के दौर में ग़ज़ल की प्रासंगिकता

आज के समाज में नाइंसाफ़ी, जंग, इंसानी हुक़ूक़ की पामाली और इज्तिमाई बे-हिसी जैसे मसाइल मौजूद हैं। ऐसे माहौल में यह नज़्म हमें याद दिलाती है कि मज़लूमो…

आज के समाज में नाइंसाफ़ी, जंग, इंसानी हुक़ूक़ की पामाली और इज्तिमाई बे-हिसी जैसे मसाइल मौजूद हैं। ऐसे माहौल में यह नज़्म हमें याद दिलाती है कि मज़लूमों के दर्द को महसूस करने के साथ हक़, इंसाफ़ और इंसानी वक़ार के लिए पुरअमन और ज़िम्मेदाराना आवाज़ उठाना भी ज़रूरी है।

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