मुंतज़िम आसीؔ के पाँच फ़िक्र-अंगेज़ क़ितआत | ज़ुल्म, मोहब्बत, क़ुर्बानी और एहसास की शायरी
मुंतज़िम आसीؔ के ये पाँच क़ितआत इंसानी ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ जज़्बात, मुआशरती रवैयों और फ़िक्री तज़ादात की अक्कासी करते हैं। इन क़ितआत में कहीं नाकामी और महरूमी के सबब पैदा होने वाली उदासी है, कहीं उजड़े हुए चमन और पामाल होती बहारों का कर्ब महसूस होता है, तो कहीं हक़गोई की पादाश में मिलने वाली सज़ा और ज़ुल्म के तसलसुल पर गहरा एहतेजाज सामने आता है। शायर ने यज़ीदियत की अलामत के ज़रिए अस्र-ए-हाज़िर के ज़ालिम किरदारों की निशानदेही की है और ये एहसास दिलाया है कि ज़माना बदलने के बावजूद ज़ुल्म की रविश ख़त्म नहीं हुई।
इन क़ितआत में मोहब्बत का एक नर्म और जज़्बाती पहलू भी मौजूद है, जहाँ महबूब की सुर्ख़ी-ए-इज़ार और रात भर रोने के तसव्वुर से एक गहरी फ़िक्रमंदी और अपनाइयत का इज़हार होता है। इसी तरह रोशनी के हुसूल के लिए अपना ही घर जलाने का ख़याल एक निहायत मानीख़ेज़ तज़ाद पैदा करता है, जो उन लोगों की क़ुर्बानी, महरूमी और बेबसी की तरफ़ इशारा करता है जो ख़ुद ज़ुल्मतों के शिकार हैं, मगर दूसरों के लिए रोशनी पैदा करने का हौसला रखते हैं।
आख़िरी क़िते में शायर वक़्त के ग़ैर-जानिबदार एहतेसाब और एहसान जताने वाले इंसानों के रवैये पर तन्क़ीद करता है। वह बावर कराता है कि वक़्त हर शख़्स को उसके आमाल का जवाब देता है, इसलिए मामूली नेकी को बड़ा एहसान बनाकर पेश करना मुनासिब नहीं। मजमूई तौर पर ये पाँचों क़ितआत जज़्बाती कैफ़ियत, समाजी शुऊर, अख़लाक़ी सवालात और फ़िक्री एहतेजाज का ख़ूबसूरत इम्तिज़ाज हैं।
अदबी एतिबार से ये क़िते मौज़ूआती तनव्वो और फ़िक्री वुसअत के हामिल हैं। शायर ने मुख़्तसर शायरी क़ालिब में ज़िंदगी के कई अहम तजुर्बे और मुआशरती रवैयों क…
अदबी एतिबार से ये क़िते मौज़ूआती तनव्वो और फ़िक्री वुसअत के हामिल हैं। शायर ने मुख़्तसर शायरी क़ालिब में ज़िंदगी के कई अहम तजुर्बे और मुआशरती रवैयों को समेटने की कोशिश की है। पहले क़िते में ज़ाती नाकामी और इज्तिमाई अलमिये का इम्तिज़ाज मिलता है, जहाँ बहार और चमन की रिवायती अलामतों को एक मुख़्तलिफ़ और दर्दनाक तनाज़ुर में बरता गया है। दूसरे क़िते में यज़ीद का हवाला तारीख़ी वाक़िए से आगे बढ़कर ज़ुल्म की दाइमी अलामत बन जाता है। इस तरह शायर माज़ी के एक मारूफ़ किरदार के ज़रिए हाल के समाजी और अख़लाक़ी मसाइल पर रोशनी डालता है।
तीसरे क़िते में महबूब की सुर्ख़ी-ए-इज़ार और रात भर रोने का तसव्वुर एक लतीफ़ जज़्बाती फ़िज़ा पैदा करता है। यहाँ सवालिया अंदाज़ महज़ गुफ़्तगू नहीं, बल्कि महबूब की कैफ़ियत जानने की बेकरारी का इज़हार है। चौथे क़िते में रोशनी और घर जलाने का तज़ाद एक गहरा अलामती मफ़हूम पैदा करता है। ये ख़याल क़ुर्बानी के साथ-साथ इस अलमिये को भी ज़ाहिर करता है कि बाज़ औक़ात महरूम इंसान दूसरों की ज़िंदगी रोशन करने के लिए अपनी ही आसाइशें क़ुर्बान कर देता है।
पाँचवें क़िते में वक़्त को जवाब देने वाली क़ुव्वत के तौर पर पेश किया गया है। शायर का लहजा यहाँ नसीहत-आमेज़ भी है और तन्क़ीदी भी। मजमूई तौर पर इन क़ितआत में सादा इज़हार, जज़्बाती शिद्दत, तारीख़ी तल्मीह, अलामती पैराया और समाजी शुऊर नुमायाँ हैं।
तन्क़ीदी नुक़्ता-ए-नज़र से इन क़ितआत की अहम ख़ूबी ये है कि शायर ज़ाती एहसासात को मुआशरती और अख़लाक़ी सवालात से जोड़ता है। यज़ीदियत की तल्मीह ज़ुल्म के…
तन्क़ीदी नुक़्ता-ए-नज़र से इन क़ितआत की अहम ख़ूबी ये है कि शायर ज़ाती एहसासात को मुआशरती और अख़लाक़ी सवालात से जोड़ता है। यज़ीदियत की तल्मीह ज़ुल्म के ख़िलाफ़ एहतेजाज को तारीख़ी गहराई अता करती है, जबकि रोशनी के लिए घर जलाने का तसव्वुर क़ुर्बानी के जज़्बे में मौजूद तल्ख़ हक़ीक़त को नुमायाँ करता है। शायर ने सवालिया अंदाज़, तज़ाद और अलामती इज़हार से अपने ख़यालात को मुअस्सिर बनाने की कोशिश की है।
बाज़ मिसरों में ज़बान-ओ-बयान की ग़ैर-मामूल तर्कीबें और लफ़्ज़ी इबहाम भी मौजूद हैं, जिन पर मज़ीद फ़न्नी नज़र-ए-सानी से इज़हार की तरसील और मानीवी वज़ाहत बेहतर हो सकती है। ताहम इन क़ितआत की बुनियादी क़ुव्वत इनके मौज़ूआत, जज़्बाती सच्चाई और समाजी शुऊर में पोशीदा है।
इन पाँच क़ितआत का मरकज़ी ख़याल इंसानी ज़िंदगी के तज़ादात, मुआशरती ना-इंसाफ़ियों और जज़्बाती कैफ़ियात को शायराना इज़हार में ढालना है। शायर एक तरफ़ अपनी…
इन पाँच क़ितआत का मरकज़ी ख़याल इंसानी ज़िंदगी के तज़ादात, मुआशरती ना-इंसाफ़ियों और जज़्बाती कैफ़ियात को शायराना इज़हार में ढालना है। शायर एक तरफ़ अपनी ज़ात की महरूमी और नाकामी का दुख बयान करता है, तो दूसरी तरफ़ ज़ुल्म के सामने हक़गोई की अहमियत उजागर करता है। मोहब्बत, एहसास, ईसार और अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी के मौज़ूआत भी इन क़ितआत को वुसअत देते हैं। शायर का बुनियादी पैग़ाम ये है कि ज़ुल्म के सामने ख़ामोशी इख़्तियार नहीं करनी चाहिए, मोहब्बत में एहसास ज़िंदा रहना चाहिए और नेकी को एहसान जताने का ज़रिया नहीं बनाना चाहिए।
पहला क़िता
मेरी हर सुबह होती है यूँ फिर नाकाम जाने दो
ख़यालों में गुज़रती है मेरी हर शाम जाने दो
मैं कैसे गीत गाऊँ जब बहारों ने चमन फूँका
मैं कैसे…
पहला क़िता
मेरी हर सुबह होती है यूँ फिर नाकाम जाने दो
ख़यालों में गुज़रती है मेरी हर शाम जाने दो
मैं कैसे गीत गाऊँ जब बहारों ने चमन फूँका
मैं कैसे कह दूँ लोगों बरसर-ए-आलाम जाने दो
मुश्किल अल्फ़ाज़:
नाकाम: नामुराद, जिसे कामयाबी हासिल न हो।
ख़यालों में गुज़रना: सोचों और तसव्वुरात में खोए रहना।
बहारें: ख़ुशहाली, ताज़गी और मसर्रत के मौसम।
चमन: बाग़, गुलशन; अलामती तौर पर ज़िंदगी या मुआशरा।
फूँकना: आग से जला देना, राख कर देना।
बरसर-ए-आलाम: मुसीबतों और दुखों के दरमियान, आलाम से दो-चार।
तशरीह:
इस क़िते में शायर अपनी ज़िंदगी की मुसलसल नाकामियों, ज़ेहनी उलझनों और दाख़िली कर्ब को बयान करता है। पहले मिसरे में सुबह का ज़िक्र एक नए आग़ाज़ और नई उम्मीद की अलामत के तौर पर आया है, लेकिन शायर की हर सुबह नाकामी के एहसास के साथ तुलू होती है। आम तौर पर सुबह इंसान के अंदर ताज़गी, हौसला और नई उमंग पैदा करती है, मगर शायर के तजुर्बे में ये उम्मीद भी पूरी नहीं हो पाती। यूँ सुबह का रोशन तसव्वुर उसकी ज़िंदगी की मायूसी के मुक़ाबले में एक दर्दनाक तज़ाद पैदा करता है।
दूसरे मिसरे में शाम का वक़्त ख़यालों में गुज़रने का ज़िक्र है। शाम आम तौर पर दिन भर की मसरूफ़ियत के बाद सुकून और फ़ुर्सत का वक़्त होती है, लेकिन शायर के लिए ये वक़्त भी ज़ेहनी इज़्तिराब, यादों और सोचों में गुम रहने का ज़रिया बन जाता है। उसकी शाम किसी ख़ुशगवार महफ़िल या इत्मीनान के बजाय ख़यालों की दुनिया में बसर होती है। सुबह की नाकामी और शाम की फ़िक्री तन्हाई मिलकर एक ऐसी ज़िंदगी का नक़्शा बनाती हैं जहाँ न उम्मीद पूरी होती है और न ज़ेहन को सुकून मयस्सर आता है।
तीसरे मिसरे में शायर एक अहम सवाल उठाता है कि जब बहारों ने ही चमन को फूँक दिया हो तो वह गीत कैसे गाए? बहार आम तौर पर हुस्न, शादाबी, ख़ुशी और ज़िंदगी की अलामत होती है, जबकि चमन ज़िंदगी, मुआशरे या इज्तिमाई माहौल की नुमाइंदगी करता है। शायर ने बहार के रिवायती मुस्बत तसव्वुर को उलटकर एक ग़ैर-मामूली और दर्दनाक सूरत पैदा की है। यहाँ बहारें ज़िंदगी को सँवारने के बजाय चमन को जला रही हैं। इस अलामती तज़ाद के ज़रिए शायर ऐसे हालात की तरफ़ इशारा करता है जहाँ ख़ुशी और तरक़्क़ी के नाम पर भी तबाही, बेचैनी और महरूमी जन्म ले रही हो।
आख़िरी मिसरे में शायर लोगों से मुख़ातिब होकर पूछता है कि जब हालात आलाम से भरे हुए हों तो वह किस तरह ख़ुशी के गीत गा सकता है या लोगों से कह सकता है कि सब कुछ मामूल के मुताबिक़ है। इसमें एक हस्सास इंसान की बेबसी भी है और हालात की संजीदगी का एतराफ़ भी। शायर का लहजा महज़ ज़ाती शिकवे तक महदूद नहीं रहता, बल्कि इसमें इज्तिमाई दुख का एहसास भी शामिल हो जाता है।
मरकज़ी मफ़हूम:
इस क़िते का मरकज़ी मफ़हूम मुसलसल नाकामी, ज़ेहनी कर्ब और मुआशरती तबाहहाली के दरमियान ख़ुशी का इज़हार न कर पाने की कैफ़ियत है। शायर के नज़दीक जब ज़िंदगी का चमन ही उजड़ रहा हो तो महज़ ख़ुशी के नग़मात गाना हक़ीक़त से आँखें चुराने के मुतरादिफ़ है।
दूसरा क़िता
जो तेरा इरादा है ज़ालिम का इरादा है
हक़ बोलने वाला ही हर बार सज़ा देह है
जब नाम लिया मैंने मालूम हुआ मुझ को
तादाद यज़ीदों की अब तक के ज़ियादा है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
इरादा: नियत, मंसूबा, किसी काम का पुख़्ता फ़ैसला।
ज़ालिम: ज़ुल्म करने वाला, जब्र-ओ-ना-इंसाफ़ी पर उतर आने वाला।
हक़: सच, इंसाफ़ और दुरुस्त बात।
सज़ा देह: असल इबारत में यही तर्कीब मौजूद है; इसके क़तई मफ़हूम में लफ़्ज़ी इबहाम है।
तादाद: गिनती, शुमार।
यज़ीद: तारीख़ी तौर पर एक मुतनाज़ा हुक्मरान; शायरी में ज़ुल्म-ओ-जब्र की अलामत के तौर पर भी इस्तेमाल होता है।
अब तक: मौजूदा वक़्त तक।
तशरीह:
इस क़िते में शायर ज़ुल्म, जब्र और हक़गोई की पादाश में मिलने वाली सज़ा पर एहतेजाज करता है। पहले मिसरे में मुख़ातब के इरादे को ज़ालिम के इरादे से तशबीह दी गई है। इसके ज़रिए शायर ये वाज़ेह करता है कि किसी शख़्स की नियत और मंसूबे को महज़ अल्फ़ाज़ से नहीं, बल्कि उसके अमल और रवैये से पहचाना जा सकता है। अगर किसी का इरादा दूसरों को दबाने, उनके हुक़ूक़ छीनने या उन पर जब्र करने का है तो वह दरहक़ीक़त ज़ालिमाना सोच का हामिल है।
दूसरे मिसरे में हक़ बोलने वाले की सज़ा का ज़िक्र है। शायर इस मुआशरती अलमिये को सामने लाता है कि बहुत से हालात में सच्चाई बयान करने वाला शख़्स ही मुख़ालिफ़त, दबाव और सज़ा का सामना करता है। इस मिसरे की तर्कीब सज़ा देह अपनी मौजूदा सूरत में कुछ मुबहम है, ताहम पूरे क़िते के सियाक़ से हक़गो इंसान को सज़ा का मुस्तहिक़ ठहराने या उसे सज़ा दिए जाने के अलमिये का एहसास नुमायाँ होता है। शायर इस रवैये पर सवाल उठाता है कि आख़िर सच बोलना जुर्म क्यों बन जाता है?
तीसरे मिसरे में शायर अपने एक तजुर्बे या मुशाहिदे का ज़िक्र करता है। वह कहता है कि जब उसने नाम लिया तो उसे एक हक़ीक़त मालूम हुई। यहाँ नाम लेने का अमल महज़ किसी एक फ़र्द की शनाख़्त तक महदूद नहीं, बल्कि एक ऐसे किरदार या रवैये की निशानदेही बन जाता है जो ज़ुल्म की नुमाइंदगी करता है।
चौथे मिसरे में यज़ीद का हवाला देकर शायर तारीख़ी तल्मीह के ज़रिए अपने अहद के ज़ालिमाना किरदारों पर तन्क़ीद करता है। यज़ीद का नाम यहाँ एक तारीख़ी शख़्सियत के ज़िक्र से आगे बढ़कर ज़ुल्म, जब्र, हक़तलफ़ी और ताक़त के नाजायज़ इस्तेमाल की अलामत बन जाता है। शायर का कहना है कि ज़माना गुज़र जाने के बावजूद यज़ीदियत की रविश ख़त्म नहीं हुई; आज भी ऐसे किरदार मौजूद हैं जो हक़ को दबाने और कमज़ोरों पर ज़ुल्म करने से बाज़ नहीं आते। इस मिसरे में माज़ी और हाल को एक फ़िक्री रिश्ते में जोड़ दिया गया है।
मरकज़ी मफ़हूम:
इस क़िते का मरकज़ी मफ़हूम ये है कि ज़ुल्म की सोच और हक़गोई को दबाने का रवैया किसी एक दौर तक महदूद नहीं। यज़ीदियत एक अलामत के तौर पर हर उस किरदार में ज़िंदा रहती है जो ताक़त के बल पर सच्चाई और इंसाफ़ को पामाल करता है। शायर हक़गोई की सज़ा और ज़ुल्म के तसलसुल पर एहतेजाज करता है।
तीसरा क़िता
क्या हुआ बोल यार ठीक तो है
इस क़दर इंतिज़ार ठीक तो है
रात भर रो रही थी शायद तू
सुर्ख़ क्यों है इज़ार ठीक तो है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
क्या हुआ: क्या बात पेश आई, क्या परेशानी है।
यार: दोस्त, महबूब या क़रीबी शख़्स।
इंतिज़ार: किसी के आने या किसी बात के होने की उम्मीद में ठहरना।
इस क़दर: इतना ज़्यादा।
शायद: गुमान है, मुमकिन है।
सुर्ख़: लाल, सुर्ख़ी माइल।
इज़ार: रुख़सार, गाल या चेहरा; असल उर्दू लफ़्ज़ عذار है।
तशरीह:
इस क़िते में शायर का लहजा पहले दो क़ितआत के एहतेजाजी और कर्बनाक अंदाज़ से मुख़्तलिफ़ होकर मोहब्बत, अपनाइयत और फ़िक्रमंदी की तरफ़ मुड़ जाता है। शायर किसी क़रीबी शख़्स या महबूब से बराह-ए-रास्त मुख़ातिब है। पहले मिसरे में वह पूछता है कि क्या हुआ, तुम बताओ, सब ठीक तो है? इस सवाल में महज़ रस्मी ख़ैरियत दरियाफ़्त करना मक़सूद नहीं, बल्कि मुख़ातब की ख़ामोशी या बदली हुई कैफ़ियत के पीछे छुपी परेशानी जानने की ख़्वाहिश मौजूद है।
दूसरे मिसरे में शायर इंतिज़ार की तवालत पर सवाल उठाता है। वह जानना चाहता है कि इतना ज़्यादा इंतिज़ार करना मुनासिब भी है या नहीं। इस सवाल में बेकरारी, मोहब्बत और किसी ताल्लुक़ की नज़ाकत पोशीदा है। इंतिज़ार यहाँ सिर्फ़ वक़्त गुज़रने का नाम नहीं, बल्कि जज़्बाती वाबस्तगी और किसी के न आने से पैदा होने वाली बेचैनी का इज़हार है।
तीसरे मिसरे में शायर अंदाज़ा लगाता है कि शायद मुख़ातब रात भर रोती रही है। लफ़्ज़ शायद इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि शायर हतमी फ़ैसला नहीं सुनाता, बल्कि मुख़ातब के चेहरे और कैफ़ियत से उसके दुख का अंदाज़ा लगाता है। इसमें मोहब्बत करने वाले की बारीकबीनी नुमायाँ होती है कि वह दूसरे शख़्स की ज़ाहिरी हालत से उसके बातिनी कर्ब को महसूस करने की कोशिश करता है।
आख़िरी मिसरे में सुर्ख़ इज़ार यानी सुर्ख़ रुख़सारों का ज़िक्र है। शायर पूछता है कि तुम्हारे रुख़सार सुर्ख़ क्यों हैं, क्या सब ख़ैरियत है? इस सवाल के पीछे ये गुमान मौजूद है कि शायद मुसलसल रोने की वजह से आँखों और चेहरे पर सुर्ख़ी आ गई है। यूँ चेहरे की एक ज़ाहिरी अलामत को अंदरूनी दुख के इज़हार का ज़रिया बनाया गया है। शायर की तवज्जोह महबूब के हुस्न से ज़्यादा उसकी कैफ़ियत और तकलीफ़ पर मरकूज़ है। यही बात इस क़िते को महज़ रोमानी इज़हार से आगे बढ़ाकर एक हस्सास इंसानी ताल्लुक़ की तस्वीर बनाती है।
मरकज़ी मफ़हूम:
इस क़िते का मरकज़ी मफ़हूम मोहब्बत में मौजूद फ़िक्रमंदी, इंतिज़ार की बेकरारी और महबूब के दुख को महसूस करने की सलाहियत है। शायर चेहरे की सुर्ख़ी से दिल के ग़म का अंदाज़ा लगाता है और मोहब्बत को दूसरे इंसान की कैफ़ियत समझने और उसकी ख़ैरियत जानने के जज़्बे से जोड़ता है।
चौथा क़िता
जानता हूँ मैं वाक़ई देंगे
जान माँगो ख़ुशी ख़ुशी देंगे
ज़ुल्मतों के शिकार हैं जो! वो
घर जलाकर के रोशनी देंगे
मुश्किल अल्फ़ाज़:
वाक़ई: हक़ीक़तन, सचमुच।
जान माँगना: ज़िंदगी या जान का मुतालबा करना।
ख़ुशी ख़ुशी: रज़ामंदी और आमादगी के साथ।
ज़ुल्मत: तारीकी, अँधेरा; अलामती तौर पर जब्र, जहालत और ना-उम्मीदी।
शिकार: किसी मुसीबत या ज़ुल्म में मुब्तला शख़्स।
रोशनी: नूर, उजाला; अलामती तौर पर उम्मीद, आगाही और निजात।
घर जलाना: अपनी पनाहगाह या आराम को क़ुर्बान कर देना।
तशरीह:
इस क़िते में शायर ने क़ुर्बानी, महरूमी और रोशनी के हुसूल के दरमियान एक गहरा और दर्दनाक तज़ाद पैदा किया है। पहले मिसरे में वह किसी ऐसे तबक़े या गिरोह की तरफ़ इशारा करता है जिसके बारे में उसे यक़ीन है कि वह क़ुर्बानी देने से दरेग़ नहीं करेगा। शायर का अंदाज़-ए-बयान पुर-एतमाद है और इसमें उन लोगों के जज़्बा-ए-ईसार पर यक़ीन झलकता है।
दूसरे मिसरे में क़ुर्बानी की इंतिहा को जान देने के तसव्वुर से वाज़ेह किया गया है। शायर कहता है कि अगर उनसे जान भी माँगी जाए तो वे ख़ुशी से देने के लिए तैयार होंगे। ये मुबालग़ा-आमेज़ इज़हार उनके अज़्म, वफ़ादारी और बे-लौस जज़्बे की शिद्दत को नुमायाँ करता है। यहाँ जान देना सिर्फ़ जिस्मानी क़ुर्बानी नहीं, बल्कि अपने मक़सद, उसूल या दूसरों की भलाई के लिए हर मुमकिन नुक़सान बर्दाश्त करने की आमादगी का इस्तिआरा भी हो सकता है।
तीसरे मिसरे में शायर उन लोगों की असल हालत बयान करता है। वे ख़ुद ज़ुल्मतों के शिकार हैं, यानी उनकी अपनी ज़िंदगी अँधेरों, महरूमियों, ना-इंसाफ़ियों या मुश्किलात में घिरी हुई है। इस मिसरे से एक अहम सवाल पैदा होता है कि जो लोग ख़ुद रोशनी से महरूम हैं, वे दूसरों के लिए रोशनी कैसे पैदा करेंगे?
चौथे मिसरे में शायर इस सवाल का जवाब एक चौंका देने वाली अलामत के ज़रिए देता है: वे अपना घर जलाकर रोशनी देंगे। घर इंसान की पनाह, तहफ़्फ़ुज़, सुकून और ज़ाती ज़िंदगी की अलामत है। घर को जलाना अपनी ही पनाहगाह और आराम को ख़त्म करने के मुतरादिफ़ है। इसके बावजूद दूसरों के लिए रोशनी पैदा करने का जज़्बा इन लोगों की क़ुर्बानी और ईसार को ज़ाहिर करता है। इस मिसरे में एक तल्ख़ मुआशरती हक़ीक़त भी पोशीदा है कि बाज़ औक़ात वे लोग दूसरों के लिए सबसे ज़्यादा क़ुर्बानी देते हैं जिनके पास ख़ुद वसाइल और आसाइशें बहुत कम होती हैं। ये ख़याल एक साथ तहसीन, दर्द और एहतेजाज की कैफ़ियत पैदा करता है।
मरकज़ी मफ़हूम:
इस क़िते का मरकज़ी मफ़हूम बे-लौस क़ुर्बानी और ईसार है। शायर ऐसे लोगों की अज़मत बयान करता है जो ख़ुद महरूमी और ज़ुल्मत में ज़िंदगी गुज़ारने के बावजूद दूसरों के लिए रोशनी पैदा करने को तैयार रहते हैं। घर जलाने की अलामत इस क़ुर्बानी की शिद्दत और उसके अलमिये को नुमायाँ करती है।
पाँचवाँ क़िता
ऐ मुश्किलों को यूँ आसान करने वाले सुन
छुपा के नोट फटी दान करने वाले सुन
जवाब वक़्त पलट कर सभी को देता है
ज़रा सी बात पे एहसान करने वाले सुन
मुश्किल अल्फ़ाज़:
मुश्किलें: दुश्वारियाँ, परेशानियाँ और रुकावटें।
आसान करना: किसी के लिए सहूलत पैदा करना या मुश्किल दूर करना।
छुपा के: पोशीदा रखकर।
नोट: काग़ज़ी करेंसी या रक़म।
फटी दान: असल इबारत में यही अल्फ़ाज़ मौजूद हैं; इस तर्कीब का मफ़हूम वाज़ेह नहीं और इसकी दुरुस्त मुराद के लिए शायर की वज़ाहत दरकार हो सकती है।
जवाब देना: किसी अमल के नतीजे या रद्दे-अमल को ज़ाहिर करना।
पलटकर: लौटकर, दोबारा सामने आकर।
एहसान: किसी पर की गई भलाई या मदद जिसे जताया जाए।
तशरीह:
इस क़िते में शायर का लहजा नसीहत-आमेज़, तंज़िया और अख़लाक़ी एहतेसाब पर मबनी है। पहले मिसरे में वह ऐसे शख़्स को मुख़ातिब करता है जो दूसरों की मुश्किलें आसान करने का दावा करता है या किसी की परेशानी दूर करने में अपना किरदार अदा करता है। लफ़्ज़ सुन के ज़रिए शायर बराह-ए-रास्त ख़िताब की फ़िज़ा क़ायम करता है। इस ख़िताब में बज़ाहिर तवज्जोह दिलाने का अंदाज़ है, लेकिन इसके पस-ए-मंज़र में एक तन्क़ीदी सवाल भी मौजूद है कि क्या मदद करने वाला वाक़ई बेग़रज़ है या उसके अमल के पीछे अपनी बरतरी जताने की ख़्वाहिश भी शामिल है?
दूसरे मिसरे में नोट छुपाने और फटी दान करने की तर्कीब आई है। इस मिसरे की आख़िरी तर्कीब अपनी मौजूदा सूरत में वाज़ेह नहीं, इसलिए इसका क़तई मफ़हूम मुतअय्यन करना दुरुस्त नहीं होगा। अलबत्ता पहले और आख़िरी मिसरे के तनाज़ुर में ये मिसरा माली मदद, उसके तरीक़ा-ए-इज़हार और उसके साथ वाबस्ता रवैये की तरफ़ इशारा करता महसूस होता है। शायर का असल ज़ोर इस बात पर मालूम होता है कि मदद और एहसान के मामले में इंसान का रवैया भी अहम है, सिर्फ़ रक़म या ज़ाहिरी अमल काफ़ी नहीं।
तीसरे मिसरे में शायर एक उमूमी अख़लाक़ी हक़ीक़त बयान करता है कि वक़्त पलटकर सबको जवाब देता है। इसका मतलब ये है कि इंसान के आमाल, रवैये और दूसरों के साथ किए गए सुलूक के नतीजे बिलआख़िर सामने आते हैं। वक़्त किसी के दावों या ज़ाहिरी शान से मुतास्सिर नहीं होता; वह हर शख़्स को उसके अमल का नतीजा दिखाता है। इस मिसरे में वक़्त को एक ऐसे मुनसिफ़ की सूरत में पेश किया गया है जो ख़ामोशी से सब कुछ देखता है और मुनासिब वक़्त पर जवाब देता है।
आख़िरी मिसरे में शायर ऐसे लोगों को तंबीह करता है जो मामूली सी बात पर भी अपना एहसान जताने लगते हैं। बज़ाहिर मदद करना एक अच्छी सिफ़त है, लेकिन जब मदद के बाद उसे बार-बार याद दिलाया जाए या दूसरे इंसान को एहसास-ए-कमतरी में मुब्तला किया जाए तो इस नेकी की अख़लाक़ी ख़ूबसूरती मुतास्सिर होती है। शायर का इशारा उस रवैये की तरफ़ है जिसमें इंसान दूसरों की मजबूरी को अपनी बरतरी दिखाने का ज़रिया बना लेता है। इस तरह क़िता इंसान को बेग़रज़ी, आजिज़ी और दूसरों की इज़्ज़त-ए-नफ़्स का ख़याल रखने की तलक़ीन करता है।
मरकज़ी मफ़हूम:
इस क़िते का मरकज़ी मफ़हूम बेग़रज़ नेकी, अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी और एहसान जताने के रवैये की मज़म्मत है। शायर याद दिलाता है कि वक़्त हर शख़्स के आमाल का जवाब देता है, इसलिए मदद को अपनी बरतरी का ज़रिया बनाने के बजाय ख़ुलूस और आजिज़ी के साथ अंजाम देना चाहिए।
मुकम्मल तास्सुर:
मुंतज़िम आसीؔ के ये पाँच क़िते मौज़ूआती तनव्वो के साथ इंसानी ज़िंदगी के कई अहम पहलुओं को सामने लाते हैं। इनमें ज़ाती नाकामी और ज़ेहनी कर्ब से लेकर मुआशरती ज़ुल्म, हक़गोई, मोहब्बत, क़ुर्बानी और अख़लाक़ी एहतेसाब तक मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत शामिल हैं। शायर कहीं अपनी महरूमी और बे-सुकूनी का इज़हार करता है, कहीं यज़ीदियत की तल्मीह के ज़रिए ज़ुल्म के तसलसुल पर एहतेजाज करता है, कहीं महबूब की कैफ़ियत से वाबस्ता एक नर्म और हस्सास जज़्बे को पेश करता है, और कहीं महरूम इंसान के ईसार को रोशनी की अलामत के ज़रिए नुमायाँ करता है।
इन क़ितआत की एक अहम ख़ूबी ये है कि शायर ज़ाती तजुर्बे और इज्तिमाई ज़िंदगी के मसाइल को एक-दूसरे से अलग नहीं रखता। उसकी शायरी में फ़र्द का दुख मुआशरे के दुख से जुड़ जाता है। सुबह और शाम की अलामतें ज़िंदगी की नाकामी और तन्हाई को ज़ाहिर करती हैं, यज़ीदियत ज़ुल्म के दाइमी रवैये की निशानदेही करती है, सुर्ख़ी-ए-इज़ार मोहब्बत की फ़िक्रमंदी को नुमायाँ करती है, जबकि घर जलाने का तसव्वुर क़ुर्बानी के अलमिये को एक यादगार शायराना पैकर अता करता है। आख़िरी क़िता इंसान को ये एहसास दिलाता है कि नेकी की असल क़द्र उसके ख़ुलूस में है, न कि उसके बदले में हासिल होने वाली तारीफ़ या एहसानमंदी में।
मजमूई तौर पर ये क़िते एहसास, एहतेजाज, ईसार और अख़लाक़ी शुऊर की मुख़्तलिफ़ जिहात का इज़हार हैं। बाज़ तर्कीबों में मानीवी इबहाम ज़रूर मौजूद है, लेकिन इनके बुनियादी मौज़ूआत और जज़्बाती सिम्त वाज़ेह तौर पर क़ारी को ग़ौर-ओ-फ़िक्र की दावत देते हैं। यही फ़िक्री और जज़्बाती तनव्वो इन क़ितआत को एक बामानी अदबी मुताला बनाता है।
इन क़ितआत में सवालिया अंदाज़, तज़ाद, तारीख़ी तल्मीह, अलामती इज़हार, जज़्बाती लहजा और मुख़्तसर पैराया-ए-बयान अहम फ़न्नी ख़ुसूसियात के तौर पर सामने आते …
इन क़ितआत में सवालिया अंदाज़, तज़ाद, तारीख़ी तल्मीह, अलामती इज़हार, जज़्बाती लहजा और मुख़्तसर पैराया-ए-बयान अहम फ़न्नी ख़ुसूसियात के तौर पर सामने आते हैं। पहले क़िते में सुबह-ओ-शाम और बहार-ओ-चमन की तस्वीरि फ़िज़ा क़ायम की गई है। दूसरे क़िते में यज़ीद का तारीख़ी हवाला मानीवी वुसअत पैदा करता है। तीसरे क़िते में सवालिया जुमलों के ज़रिए जज़्बाती कैफ़ियत उभरती है। चौथे क़िते में रोशनी और घर जलाने का तज़ाद एक मुअस्सिर शायराना पैकर बनाता है, जबकि आख़िरी क़िते में वक़्त को जवाब देने वाली क़ुव्वत बनाकर अख़लाक़ी पैग़ाम पेश किया गया है।
इन क़ितआत में सुबह उम्मीद और नए आग़ाज़ की अलामत है, शाम उदासी और फ़िक्री तन्हाई का इस्तिआरा बनती है, जबकि चमन इंसानी ज़िंदगी और मुआशरती माहौल की नुमाइ…
इन क़ितआत में सुबह उम्मीद और नए आग़ाज़ की अलामत है, शाम उदासी और फ़िक्री तन्हाई का इस्तिआरा बनती है, जबकि चमन इंसानी ज़िंदगी और मुआशरती माहौल की नुमाइंदगी करता है। बहार ख़ुशहाली और मसर्रत की अलामत होने के बावजूद पहले क़िते में एक उल्टी और दर्दनाक सूरत इख़्तियार करती है। यज़ीद ज़ुल्म, जब्र और बातिल क़ुव्वतों की अलामत है। सुर्ख़ी-ए-इज़ार महबूब की जज़्बाती कैफ़ियत की तरफ़ इशारा करती है। रोशनी उम्मीद, आगाही और ज़िंदगी की अलामत है, जबकि घर जलाना क़ुर्बानी, महरूमी और अपने वसाइल को दूसरों के लिए क़ुर्बान करने के मफ़हूम को ज़ाहिर करता है। वक़्त एहतेसाब और अंजाम की अलामत बनकर सामने आता है।
शायर ने चमन, बहार, सुबह, शाम, ज़ुल्मत, रोशनी और घर जैसे मानूस अल्फ़ाज़ को वसीअ मानीवी तनाज़ुर में इस्तेमाल किया है। चमन ज़िंदगी और मुआशरे का इस्तिआरा …
शायर ने चमन, बहार, सुबह, शाम, ज़ुल्मत, रोशनी और घर जैसे मानूस अल्फ़ाज़ को वसीअ मानीवी तनाज़ुर में इस्तेमाल किया है। चमन ज़िंदगी और मुआशरे का इस्तिआरा है, जबकि ज़ुल्मत जहालत, जब्र और ना-उम्मीदी की नुमाइंदगी करती है। रोशनी उम्मीद और शुऊर का इस्तिआरा बनती है। घर जलाने का तसव्वुर एक बलीग़ तज़ाद पैदा करता है, जिसमें रोशनी हासिल करने की क़ीमत अपनी ही पनाहगाह को क़ुर्बान करना है। यज़ीद का नाम तारीख़ी तल्मीह के साथ ज़ुल्म की एक मुस्तक़िल अलामत बन जाता है।
मुंतज़िम आसीؔ के इन क़ितआत में कई फ़िक्री ज़ाविये नुमायाँ हैं। शायर ज़ाती नाकामी और महरूमी को महसूस करते हुए भी मुआशरती मसाइल से ला-तअल्लुक़ नहीं रहता…
मुंतज़िम आसीؔ के इन क़ितआत में कई फ़िक्री ज़ाविये नुमायाँ हैं। शायर ज़ाती नाकामी और महरूमी को महसूस करते हुए भी मुआशरती मसाइल से ला-तअल्लुक़ नहीं रहता। वह हक़गोई को एक अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी समझता है और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों की मुश्किलात को नुमायाँ करता है। उसके यहाँ मोहब्बत महज़ रोमानी जज़्बा नहीं, बल्कि दूसरे इंसान की तकलीफ़ महसूस करने और उसकी कैफ़ियत जानने का नाम भी है। क़ुर्बानी के तसव्वुर में शायर महरूम इंसान के ईसार को अहमियत देता है, जबकि आख़िरी क़िते में एहसान जताने के रवैये पर तन्क़ीद करते हुए वक़्त के मुनसिफ़ाना एहतेसाब पर यक़ीन ज़ाहिर करता है।
मौजूदा दौर में ये क़िते इस लिए अहमियत रखते हैं कि आज भी हक़ बोलने वालों को मुख़ालिफ़त और मुश्किलात का सामना करना पड़ता है, मुआशरती सतह पर ज़ुल्म और ना…
मौजूदा दौर में ये क़िते इस लिए अहमियत रखते हैं कि आज भी हक़ बोलने वालों को मुख़ालिफ़त और मुश्किलात का सामना करना पड़ता है, मुआशरती सतह पर ज़ुल्म और ना-इंसाफ़ी के मुख़्तलिफ़ मज़ाहिर मौजूद हैं और इंसान अपनी ज़ाती परेशानियों के बावजूद दूसरों के लिए क़ुर्बानी देता है। यज़ीदियत की अलामत आज भी हर उस किरदार और रवैये पर मुन्तबिक़ हो सकती है जो ताक़त के बल पर हक़ को दबाने की कोशिश करता है। इसी तरह रोशनी के लिए घर जलाने का तसव्वुर उन अफ़राद की हालत की तर्जुमानी करता है जो ख़ुद मुश्किलात में घिरे होने के बावजूद दूसरों के लिए आसानियाँ पैदा करते हैं। वक़्त के एहतेसाब का पैग़ाम भी आज के मुआशरे में अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी, आजिज़ी और बेग़रज़ नेकी की याद-दिहानी कराता है। यही मौज़ूआती मानीवियत इन क़ितआत को अस्र-ए-हाज़िर के क़ारी के लिए क़ाबिल-ए-तवज्जोह बनाती है।
✍️ मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी — संक्षिप्त परिचय
### मुंतज़िम आसी — एक तफ़सीली अदबी तआरुफ़
मुंतज़िम आसी उर्दू अदब की दुनिया में एक ऐसे शख़्स के तौर पर सामने आते हैं जिनकी अदबी ज़िंदगी में शायरी, रूहानियत, मुतालआ, इल्म-ए-अरूज़ और अदबी ख़िदमत एक-दूसरे से जुड़ी हुई नज़र आती हैं। उनकी शख़्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने शायरी को महज़ शौक़ नहीं बल्कि एक लगातार जारी रहने वाले जुनून और ज़िम्मेदारी के तौर पर अपनाया।
उनका अदबी सफ़र किसी एक दिन …
قطعہ اردو شاعری کی ایک مختصر صنف ہے جس میں چار یا زیادہ مصرعے ایک موضوع پر ہوتے ہیں۔




अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी करें!