अंजीर की मिठाई, अज़मत इक़बाल
अंजीर की मिठाई !अपने गालों पर पड़े थप्पड़ों की सनसनाहट उसे अब तक अपने दिमाग में महसूस हो रही थी। एक ज़बरदस्त घूंसा उसकी दाहिनी आँख के बिल्कुल निचले हिस्से पर पड़ा था। दोनों आँखों से लगातार आँसू कतार की शक्ल में बह रहे थे। दाहिनी आँख से निकल रहे आँसुओं का सबब घूंसे की तीव्रता से अधखुली आँख में हो रहा दर्द था, अन्दर का कर्ब बाईं आँख से आँसुओं की शक्ल में उबल रहा था।रात के अँधेरे में वह गथ्मगत्था होते क़दमों से आगे बढ़े जा रहा था। उसे बस की रफ़्तार पूरी तरह से थम जाने का इंतज़ार किए बग़ैर धक्का दे कर बाहर फेंक दिया गया था।आज हफ़्ते का आख़िरी रोज़ होने के सबब मामूली के मुताबिक़ वह कुछ देर से फैक्ट्री से निकला। आने वाली क़यामत से बेख़बर जब वह बस में सवार हुआ तो भूख के सबब उसके ख़ाली पेट में ऐंठन सी महसूस हो रही थी।“अरे बहन जी सुनो तो, भाई मैंने जान बूझ कर कुछ नहीं किया—”उसके मुक़ावमती अल्फ़ाज़ गालियों की बौछार में दब कर रह गए।इस से पहले कि बस कंडक्टर मामले में मुदाख़लत करता मुसाफ़िर कनाल को सबक़ सिखा चुके थे। कुछ मुसाफ़िर ख़ामोश तमाशाबीन का किरदार अदा करते रहे और कुछ ने अपने काम से काम रखने की पॉलिसी पर अमल किया।बड़े बालों वाले, सियाह चश्मा लगाए लहीम शहीम नौजवान ने जब उसे गर्दन से पकड़ कर नीचे झुकाया और नोकदार सख़्त कुहनी से रीढ़ की हड्डी के दर्मियानी हिस्से पर ज़बरदस्त चोट की तो उसे अपनी रूह पेट से होती हुई मुँह के ज़रिए निकलती महसूस हुई।जब एक ज़ोरदार लात उसकी टाँगों के बीच पड़ी तो जिस्म के दूसरे हिस्सों के दर्द पर टाँगों के बीच का दर्द हावी हो गया।कुछ देर पहले तूफ़ानी बारिश और तेज़ हवा के क़हर ने लोगों को अपने घरों में मुक़ैयद और रास्तों को वीरान कर दिया था। वह रुक रुक कर गुज़रने वाली ऑटो को काँपते हाथों से रुकने का इशारा करता रहा। मगर उसके नक़ाहत और दर्द से डोलते वुजूद पर ऑटो वालों को किसी आवारा शराबी का गुमान होता और वे बेतوج्जोही से आगे बढ़ जाते।मुख़ालिफ़ सम्त से आ रही कार की हेडलाइट की तेज़ रौशनी ने उसकी आँखों को चौंधिया दिया। एक पल को गोया वह होश में आया। उसे याद आया उसने मनोरमा की फ़रमाइश पर उसकी पसंदीदा अंजीर की मिठाई ख़रीदी थी। मिठाई का पैकेट कब उसके हाथों से छूट कर गिरा उसे पता ही नहीं चला। वह अपने लागर जिस्म को घसीटता हुआ आगे बढ़ता गया।।۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔हसब-ए-मामूल कनाल के इंतज़ार में मनोरमा की तवज्जोह दरवाज़े पर होने वाली दस्तक पर मर्कूज़ थी। उसने गुड़िया को अपनी छाती से धीरे से अलग किया उसके माथे को हल्के से चूमा और आहिस्ता से झूले में डाल दिया। पिछले एक घंटे से बिजली बंद थी। एक पल ठहर कर दीवार पर टंगे आईने पर उसने एक निगाह डाली। चिराग़ की मद्धम रौशनी में उसकी नाक में लटक रही सुनहरी नथ की चमक उसके चेहरे के गोरे रंग को मज़ीद जाज़िबियत बख़्श रही थी। यह नथ कनाल ने उसे शब-ए-उर्सी के वक़्त बतौर तोहफ़ा दी थी। कई दफ़ा पैसों की शदीद ज़रूरत के वक़्त मनोरमा ने नथ को तोड़ कर रक़म हासिल करने का इरादा ज़ाहिर किया लेकिन कनाल ने मना कर दिया। सात फेरे लेने के बाद तीन से चार बरस मआशी आसूदगी में गुज़रे। जब तक कि कनाल के बाप ने अपने चारों बेटों को एक कारोबार की डोर से बाँधे रखा था। गाँव में शादी ब्याह और त्योहार के मौक़ों पर अक्सर लोग इसी परिवार की कपड़े की दुकान महा लक्ष्मी का रुख़ करते थे। और फिर एक रोज़ लक्ष्मी की पूजा करते हुए सेठ किशोरी लाल चक्कर आ कर ऐसे गिरे कि दोबारा उठ नहीं पाए। डॉक्टर ने बताया ज़बरदस्त स्ट्रोक था जिसे सत्तर सालह सेठ का कमज़ोर दिल बर्दाश्त न कर सका। कुछ ही दिन गुज़रे कि परिवार में महाभारत शुरू हो गई जिसका इख़्तिताम कारोबार और घर के बँटवारे पर हुआ। कनाल ने अपने बड़े भाइयों से उलझने की बजाए गाँव छोड़ कर सैकड़ों मील दूर राजधानी में आ कर नए सिरे से मनोरमा के साथ ज़िंदगी का सफ़र तय करने को तर्जीह दी। जो कुछ उसके हिस्से में आया उससे उसने कच्ची बस्ती में एक झुग्गी नुमा मकान ख़रीद लिया। उसे कोल्ड ड्रिंक की फैक्ट्री में हेल्पर के तौर पर काम मिल गया। चंद महीनों में ही उसने मशीन चलाना सीख लिया। उसकी तनख़्वाह में भी इज़ाफ़ा हो गया। उनकी ज़िंदगी के अगले तीन चार बरस बड़े परसुकून व परमस्रत गुज़रे। सिवाए औलाद के ग़म के। एक बार अनाथालय से बच्चा लेने का इरादा भी किया लेकिन तयशुदा शर्तों पर पूरा न उतर पाने के सबब उन्हें नाउम्मीदी हाथ आई। और फिर उनकी ज़िंदगी में ख़ुशगवार मोड़ उस वक़्त आया जब मनोरमा ने उसे ख़बर दी कि वह उम्मीद से है। गुड़िया डेढ़ बरस की हो चुकी थी।गुड़िया के रोने की आवाज़ सुन मनोरमा ने आईने से नज़रें हटाईं और पलट कर झूले को धक्का दिया। गुड़िया ने आँखें मूँद लीं और पल भर में गहरी नींद सो गई।मनोरमा ने टिक टिक करती दीवार घड़ी पर नज़र डाली। वह रोज़ाना दस बजे से पहले खाना खा कर कनाल के पहलू में लेट जाया करती थी। घड़ी की छोटी सुई दस के नंबर से आगे बढ़ती देख अब उसे फ़िक्र होने लगी। कुंडी की खड़खड़ाहट ने उसके चेहरे पर आई फ़िक्र की शिकन को काफ़ूर कर दिया।दरवाज़ा खोलते ही कनाल ने अपने जिस्म का बोझ मनोरमा के हवाले कर दिया था।“पानी” कनाल की कमज़ोर आवाज़ ने मनोरमा के वुजूद को मुज़्तरीब कर दिया। मशक्क़त के बाद मनोरमा ने कनाल को बिस्तर तक पहुँचाया।“आप की यह हालत कैसे हुई? कुछ तो बताएँ?”कई बार पूछने पर भी कनाल ने कोई रिएक्शन नहीं दिया तो उसने उसे अस्पताल ले जाने का फ़ैसला किया। पड़ोसी रिक्शा वाले की मदद से किसी तरह उसे रिक्शा में डाल कर वह उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश में लग गई।۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔“इकराम भाई कृपा करके रिक्शा तेज़ चलाएँ।”“जी दीदी,”ऑटो वाला ख़तरनाक हद तक आने वाले मोड़ पर ऑटो मोड़ते हुए बोला।मनोरमा की गोद में अस्पताल हालात से बेख़बर टिकटी लगाए ऑटो रिक्शा की छत पर रौशन बल्ब को घूरे जा रही थी। कनाल का सर अपने कंधे पर टिकाते हुए वह बोली,“हिम्मत रखिए हम जल्दी हॉस्पिटल पहुँच जाएँगे।”कनाल के बालों में हल्के से उँगलियाँ फेरते हुए उसने ख़ुद को तसल्ली देने की कोशिश की।अस्पताल के लिए निकले उन्हें लगभग आधा घंटे का वक़्त गुज़र चुका था।ख़ुनक और तेज़ हवा के बावजूद कनाल का जिस्म पसीने में शराबोर हुआ जा रहा था।“हे भगवान?”अब वह रोने लगी।“टेंशन न लो दीदी बस हम हॉस्पिटल पहुँच ही गए।”इकराम अस्पताल के गेट के सामने ऑटो को ब्रेक लगाता हुआ बोला।۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔“यह तो पुलिस केस है। पहले कंप्लेंट करनी होगी—”वार्ड बॉय ने अस्पताल के उसूल समझाते हुए मनोरमा से कहा।“भैया इनकी हालत बहुत ख़राब है। कृपा करके आप डॉक्टर को बुलाएँ।”मनोरमा ने स्ट्रेचर पर बेसुध पड़े अपने पति की जानिब इशारा करते हुए वार्ड बॉय से इल्तिजा की।मनोरमा की आँखों में बेचारगी देख वार्ड बॉय बोला,“ठीक है आप पहले फ़ार्म ले कर भर लें फिर हम पेशेंट को अंदर लेते हैं।”“भैया तुम पेशेंट को अंदर लो हम फ़ार्म ले कर आते हैं।”इकराम लगभग दौड़ता हुआ फ़ार्म हासिल करने के लिए खिड़की की तरफ़ लपका।वार्ड बॉय एक पल को रुका। वह मनोरमा से बोला,“बहन जी आप इधर ही रुको।”वह स्ट्रेचर खींचता हुआ इमरजेंसी वार्ड में ले गया।फ़ार्म जमा करने के बाद इकराम मनोरमा के क़रीब आ कर बोला,“धीरज रखें दीदी हम हॉस्पिटल पहुँच गए हैं। भगवान सब ठीक कर देगा।”“पेशेंट के साथ कौन आया है।”बाहर आ कर नर्स ने पूछा।“यह इनकी पत्नी हैं।”इकराम ने आगे बढ़ कर नर्स से कहा,“और आप?”“मैं इनका पड़ोसी हूँ। मैं अपनी ऑटो में इन्हें ले कर आया हूँ।”नर्स एक लम्हे के लिए रुकी। और मनोरमा को हाथ से रुकने का इशारा करते हुए बोली,“बहन जी आप इधर ही रुको। भैया आप अंदर आ जाओ।”मनोरमा ने परेशान नज़रों से इकराम की तरफ़ देखा।“दीदी आप यहाँ बैठ जाओ मैं देखता हूँ।”इकराम ने सामने रखे बेंच की तरफ़ इशारा करते हुए मनोरमा से कहा।۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔केबिन में दाख़िल होने के बाद इकराम ने डॉक्टर को हाथ जोड़ कर नमस्ते किया और टेबल के सामने खड़ा हो गया।“देखो भैया इस आदमी की किसी से हाथापाई हुई है। जिस्म पर कुछ ज़ख़्म के निशान हैं। वैसे तुम कौन हो इसके?”“जी साहब पड़ोसी हूँ।”“साथ में कोई रिश्तेदार नहीं आया?”“जी इनकी पत्नी बैठी है बाहर। बुलाऊँ?”“नहीं रहने दो आगे की बात इसे तुम ही बता देना।”ऑटो वाला बेचैन सवालीया नज़रों से डॉक्टर की जानिब देख रहा था।“बात यह है कि इस आदमी की नब्ज़ थम गई है। ज़ख़्म इतने गहरे तो नहीं कि जान चली जाए। मौत की वजह पोस्टमार्टम के बाद ही पता चलेगी। हो सकता है हार्ट अटैक की वजह से डेथ हुई हो।”۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔अस्पताल में नाइट शिफ्ट पर आने वाला स्टाफ़, स्टाफ़ रूम में अपनी ड्यूटी लेने की तैयारी कर रहा था।“क्या बात है गुलाबू आज बड़ी चहक रही हो?”जवानी की दहलीज़ पर अभी अभी क़दम रखने वाली नर्स अपनी साथी नर्स से बोली।“अब तेरे से क्या छुपाना—आज हमारी शादी की सालगिरह थी—उनकी माँ बीमार है—दो दिन से गाँव गए हुए हैं—”साथी नर्स ने झूठी हमदर्दी का इज़हार किया।“अरे यह तो बैड लक हो गया—”वह बोली,“नहीं रे ऐसा कुछ नहीं—मनोज है ना! वह बोला टेंशन मत ले तेरी एनिवर्सरी अपन मनाएगा—वह मुझे फ़िल्म देखने ले गया था—और पता है एक बहुत बड़ी होटल में डिनर भी कराया उसने—”एप्रन पहनते हुए वह बोली। तीस से पैंतीस बरस की उम्र में भी उसकी आँखों की चमक से ज़ाहिर होता था कि वह ज़िंदगी खुल कर जीने की आदी है।“कभी हमें भी साथ ले चल।”वार्ड बॉय रूम में दाख़िल होते हुए नर्स का जुमला सुन कर शरारत भरे अंदाज़ में उसकी गर्दन पर हल्की सी चपत लगाते हुए बोला।“ए भोंदू चल अपने काम से काम रख।”नर्स ने उसे धक्का देते हुए कहा।“अरे यह तेरे हाथ पर निशान कैसा?”वार्ड बॉय ने नर्स का हाथ अपने हाथ में ले कर पूछा।“अरे मत पूछ यार ज़माना बड़ा बुरा है—एक औरत का घर से निकलना मुश्किल हो गया है—कलयुग है कलयुग।”“क्यों क्या हो गया?”“चल ज़्यादा डीप में मत जा—ले मिठाई खा।”वह अंजीर की मिठाई का आधा पिचका पैकेट पर्स से निकाल कर टेबल पर रखते हुए बोली।———————-
अज़मत इक़बाल
९९७०६६६७८५
महाराष्ट्र, मालेगाँव, इंडिया
कनाल एक गरीब फैक्टरी वर्कर है। हफ़्ते के आख़िरी दिन वह लेट बस पकड़ता है। बस में किसी बात पर मुसाफ़िर उसे बहुत मार देते हैं – घूंसे, लातें और कुहनियाँ। ज़ख्मियों की हालत में उसे बस से फेंक दिया जाता है। अँधेरी रात और बारिश में वह घर जाने की कोशिश करता है। रास्ते में उसे याद आता है कि उसने बीवी मनोरमा के लिए अंजीर की मिठाई खरीदी थी, मगर पैकेट हाथ से गिर चुका होता है। घर पहुँचते ही वह गिर जाता है। मनोरमा उसे अस्पताल ले जाती है। डॉक्टर बताता है कि उसकी नब्ज़ थम चुकी है – शायद हार्ट अटैक से मौत हुई। कहानी के आख़िर में अस्पताल की नर्स स्टाफ़ रूम में वही आधा पिचका अंजीर की मिठाई का पैकेट निकाल कर खा रही होती है।
गरीबी, मज़दूर क्लास की मजबूरी और सामाजिक ज़ुल्म के साथ छोटी खुशियों का ट्रैजिकल अंजाम। अंजीर की मिठाई मोहब्बत और नुकसान का केंद्रीय अलमती निशान है।
यह रियलिस्टिक शॉर्ट स्टोरी है जिसमें सादी ज़बान, स्ट्रॉन्ग कैरेक्टराइज़ेशन और ड्रामैटिक आयरनी इस्तेमाल की गई है। मनोरमा और कनाल का रिश्ता दिलचस्प है ज…
यह रियलिस्टिक शॉर्ट स्टोरी है जिसमें सादी ज़बान, स्ट्रॉन्ग कैरेक्टराइज़ेशन और ड्रामैटिक आयरनी इस्तेमाल की गई है। मनोरमा और कनाल का रिश्ता दिलचस्प है जबकि सोसाइटी की बे-रहेमी साफ नज़र आती है।
स्टोरी सोशल रियलिज्म की कामयाब मिसाल है। वॉयलेंस और क्लास डिफरेंस को इफेक्टिव तरीके से दिखाया गया है। मगर कुछ कैरेक्टर्स (जैसे नर्स) थोड़े अंडरडेवलप्ड…
स्टोरी सोशल रियलिज्म की कामयाब मिसाल है। वॉयलेंस और क्लास डिफरेंस को इफेक्टिव तरीके से दिखाया गया है। मगर कुछ कैरेक्टर्स (जैसे नर्स) थोड़े अंडरडेवलप्ड रह गए हैं। एंडिंग का शॉक वैल्यू बहुत क़वी है।
“उसे याद आया उसने मनोरमा की फरमाइश पर उसकी पसंदीदा अंजीर की मिठाई खरीदी थी…”
यह इक़्तेबास कनाल की मोहब्बत और क़ुर्बानी को दिखाता है। वह अपनी पेशे से …
“उसे याद आया उसने मनोरमा की फरमाइश पर उसकी पसंदीदा अंजीर की मिठाई खरीदी थी…”
यह इक़्तेबास कनाल की मोहब्बत और क़ुर्बानी को दिखाता है। वह अपनी पेशे से मजबूर होने के बावजूद बीवी की खुशी के लिए मिठाई लाता है। पैकेट का गिरना उसकी ज़िंदगी के कंट्रोल के खत्म होने का अलमती इशारा है।
“वह अंजीर की मिठाई का आधा पिचका पैकेट पर्स से निकाल कर टेबल पर रखते हुए बोली।”
यह एंडिंग का इक़्तेबास पूरे स्टोरी का ट्रैजिक आयरनी कंप्लीट करता है। वही मिठाई जो मोहब्बत का तोहफ़ा थी, अब नर्स के हाथ में आ कर बेकार और बे-मानी बन जाती है। कनाल की मौत के बाद उसकी आख़िरी खुशी भी दूसरों के पास चली जाती है।
स्ट्रॉन्ग ओपनिंग, इफेक्टिव फ्लैशबैक, ड्रामैटिक आयरनी, रियलिस्टिक डायलॉग, टाइट स्ट्रक्चर और इमोशनल क्लाइमेक्स।
अंजीर की मिठाई = मोहब्बत + क़ुर्बानी + लॉस्ट जॉय
बस और मारपीट = सामाजिक ज़ुल्म
नथ = रिश्तों की क़ीमत
डार्क नाइट और रेन = होपलेसनेस
“रूह पेट से होती हुई मुँह के ज़रिए निकलती” – एक्स्ट्रीम पेन की स्ट्रॉन्ग तशबीह।
“गथ्म गत्था होते क़दमों” – वीकनेस और स्ट्रगल की इस्तेआरा।
“आँसू क़ता…
“रूह पेट से होती हुई मुँह के ज़रिए निकलती” – एक्स्ट्रीम पेन की स्ट्रॉन्ग तशबीह।
“गथ्म गत्था होते क़दमों” – वीकनेस और स्ट्रगल की इस्तेआरा।
“आँसू क़तार की शक्ल में” – कंटिन्युअस सफरिंग की विज़ुअल इमेज।
अज़मत इक़बाल मज़दूर क्लास के साथ डीप सिंपथी रखते हैं। वह समाज की बे-रहेमी, वॉयलेंस और गरीबी के ख़िलाफ आवाज़ उठाते हैं। लव और फैमिली वैल्यूज़ को भी अहम…
अज़मत इक़बाल मज़दूर क्लास के साथ डीप सिंपथी रखते हैं। वह समाज की बे-रहेमी, वॉयलेंस और गरीबी के ख़िलाफ आवाज़ उठाते हैं। लव और फैमिली वैल्यूज़ को भी अहमियत देते हैं।
आज भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में वॉयलेंस, वर्किंग क्लास की मजबूरी, मेडिकल सिस्टम की कमियाँ और गरीबी मौजूद हैं। स्टोरी आज के दौर में भी इक्वली रिलीवेंट है।




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