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ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना

मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी منگل، 3 نومبر 2026
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ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
बाबा की नसीहत को हर आन निभा देना
तकलीफ़ मुसीबत को ज़ाहिर न कभी करना
जो सास ससुर बोले तो काम सभी करना
जो बात रहे दिल में वो बात बता देना
ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
तू फ़ातिमा ज़हरा की सीरत को पढ़ा करना
शोहर की तेरे ख़िदमत बेटी तू सदा करना
जब थक के वो आए तो पैर उसके दबा देना
ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
📖 सार

यह नज़्म एक बाप की तरफ़ से अपनी बेटी के नाम मोहब्बत, नसीहत और ज़िंदगी के तजुर्बे से भरा हुआ पैग़ाम है। इसमें शादी के बाद बेटी को नए घर और नए रिश्तों के साथ मोहब्बत, सब्र, बर्दाश्त और ख़ुश-अख़लाक़ी से ज़िंदगी गुज़ारने की तलक़ीन की गई है। बाप अपनी बेटी को समझाता है कि ससुराल सिर्फ़ एक नया घर नहीं होता, बल्कि मुख़्तलिफ़ मिज़ाज और आदतों के लोगों के साथ रिश्ता बनाने का एक नया मरहला होता है। इस मरहले में अगर मोहब्बत, समझदारी और हुस्ने-सुलूक को अपनाया जाए तो घर का माहौल ख़ुशगवार बन सकता है।

नज़्म में सास और ससुर के साथ अदब-ओ-एहतराम, शोहर के साथ वफ़ादारी और घर के मामलों में ज़िम्मेदारी का एहसास नुमायाँ है। शायर बेटी को यह सबक़ देता है कि हर बात का जवाब ग़ुस्से से देना ज़रूरी नहीं, बल्कि कई मौक़ों पर ख़ामोशी, नर्मी और हिकमत से काम लेना रिश्तों को टूटने से बचा सकता है। बाप की नसीहत में यह फ़िक्र भी शामिल है कि बेटी अपने किरदार और रवैये से नए घर में ऐसी जगह बनाए जहाँ मोहब्बत और अपनायत का एहसास पैदा हो।

दूसरे बंद में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा की सीरत को नमूना बनाकर बेटी को पाकीज़ा किरदार, सादगी, ख़िदमत और घर की ज़िंदगी के हुस्ने-अख़लाक़ की तरफ़ मुतवज्जेह किया गया है। शोहर की ख़िदमत और उसकी थकान का ख़याल रखने की बात के ज़रिए शायर घर के रिश्तों में मोहब्बत और एक-दूसरे की ज़रूरतें समझने का जज़्बा पैदा करता है।

अलबत्ता इस नज़्म के पैग़ाम को एक मुतवाज़िन नज़रिए से समझना भी ज़रूरी है। घर को जन्नत बनाना सिर्फ़ बेटी की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि शोहर, सास, ससुर और घर के तमाम अफ़राद का मुश्तरका फ़र्ज़ है। सब्र का मतलब नाइंसाफ़ी या ज़ुल्म को चुपचाप बर्दाश्त करना नहीं, बल्कि समझदारी और इज़्ज़त के साथ मसाइल को हल करना है। इस पहलू से नज़्म एक बाप की मोहब्बत भरी नसीहत के साथ-साथ घरेलू ज़िंदगी में अख़लाक़ी रवैये की अहमियत को भी उजागर करती है।

📚 साहित्यिक समीक्षा

अदबी एतिबार से यह नज़्म एक सादा, पुरअसर और नसीहत आमेज़ तख़्लीक़ है। इसका मौज़ू हमारे मुआशरे के एक अहम और हस्सास पहलू, यानी बेटी की रुख़्सती और शादी के…

अदबी एतिबार से यह नज़्म एक सादा, पुरअसर और नसीहत आमेज़ तख़्लीक़ है। इसका मौज़ू हमारे मुआशरे के एक अहम और हस्सास पहलू, यानी बेटी की रुख़्सती और शादी के बाद की घरेलू ज़िंदगी, से ताल्लुक़ रखता है। शायर ने एक बाप के जज़्बात को अपनी नज़्म का मरकज़ी हवाला बनाया है। बाप की नसीहत में मोहब्बत भी है, फ़िक्र भी और बेटी के मुस्तक़बिल के लिए एक गहरी तमन्ना भी।

नज़्म का लहजा गुफ़्तगू जैसा है। इसमें कोई पेचीदा फ़लसफ़ियाना अल्फ़ाज़ या मुश्किल इस्तिआरे इस्तेमाल नहीं किए गए, बल्कि रोज़मर्रा ज़िंदगी से क़रीब अल्फ़ाज़ के ज़रिए अपनी बात समझाई गई है। यही सादगी नज़्म की एक अहम अदबी ख़ूबी है। शायर चाहता है कि उसका पैग़ाम सिर्फ़ अदबी हल्क़ों तक महदूद न रहे, बल्कि आम घरों, माँ-बाप और बेटियों तक भी पहुँचे।

पहले बंद में बेटी को ससुराल के माहौल में ख़ुद को ढालने, बुज़ुर्गों के साथ हुस्ने-सुलूक करने और रिश्तों में नर्मी बरक़रार रखने की नसीहत मिलती है। यहाँ बाप का तजुर्बा और बेटी के लिए उसकी फ़िक्र एक साथ नज़र आते हैं। दूसरे बंद में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा की सीरत का हवाला देकर नज़्म को एक रूहानी और अख़लाक़ी पहलू दिया गया है। इस हवाले से शायर ने अपने पैग़ाम को सिर्फ़ समाजी रिवायत तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे दीनी और अख़लाक़ी मिसाल से भी जोड़ दिया है।

रदीफ़ "ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना" नज़्म के तमाम अशआर को एक मरकज़ी फ़िक्र में जोड़ती है। इस जुमले की तक़रार से बाप की तमन्ना और बेटी के लिए उसकी नसीहत में ताकीद पैदा होती है। हर बंद इसी मरकज़ी ख़याल की तरफ़ लौटकर नज़्म के पैग़ाम को मज़बूत बनाता है।

नज़्म की एक अहम अदबी ख़ूबी उसका समाजी रब्त है। इसमें पेश किए गए जज़्बात हमारे मुआशरे के उन घरों की तस्वीर पेश करते हैं जहाँ बेटी की रुख़्सती को एक नए सफ़र की इब्तिदा समझा जाता है। शायर ने इस सफ़र में मोहब्बत और अख़लाक़ की अहमियत को नुमायाँ किया है।

ताहम, नज़्म को जदीद समाजी तनाज़ुर में पढ़ते हुए यह बात भी समझना ज़रूरी है कि घर को जन्नत बनाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ औरत पर नहीं डाली जा सकती। शोहर और ससुराल के अफ़राद का भी फ़र्ज़ है कि वे बेटी को इज़्ज़त, तहफ़्फ़ुज़, मोहब्बत और अपनायत दें। इसी मुतवाज़िन समझ के साथ नज़्म का अख़लाक़ी पैग़ाम और ज़्यादा वसीअ और मानीख़ेज़ हो जाता है।

मजमूई तौर पर यह नज़्म सादगी, जज़्बाती सच्चाई, ख़ानदानी रवाबित और अख़लाक़ी तालीम का एक ख़ूबसूरत इज़हार है।

🖋️ आलोचनात्मक समीक्षा

तनक़ीदी नुक़्ता-ए-नज़र से नज़्म एक ऐसे समाजी तसव्वुर को पेश करती है जहाँ बेटी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने सब्र, ख़िदमत और अच्छे रवैये से नए घर में…

तनक़ीदी नुक़्ता-ए-नज़र से नज़्म एक ऐसे समाजी तसव्वुर को पेश करती है जहाँ बेटी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने सब्र, ख़िदमत और अच्छे रवैये से नए घर में ख़ुशगवार माहौल पैदा करे। शायर का मक़सद बेटी को रिश्तों की नज़ाकत समझाना और उसके मुस्तक़बिल के लिए बेहतरीन रवैये की रहनुमाई करना है।

नज़्म की ताक़त इसकी सीधी और वाज़ेह ज़बान में है। बाप की नसीहत में बनावट के बजाय जज़्बाती इख़्लास महसूस होता है। लेकिन कुछ मिसरों, ख़ास तौर पर "तकलीफ़ मुसीबत को ज़ाहिर न कभी करना" में मज़ीद वज़ाहत की गुंजाइश है। इस बात को हिकमत, सब्र और नर्मी के मानी में लेना चाहिए, न कि अपनी परेशानी, नाइंसाफ़ी या ज़ुल्म को हमेशा छुपाने के हुक्म के तौर पर।

इसी तरह घर को जन्नत बनाने के लिए बेटी के साथ दूसरे घरवालों का तआवुन भी ज़रूरी है। अगर नज़्म के पैग़ाम को मुश्तरका ज़िम्मेदारी और बाहमी एहतराम के तनाज़ुर में समझा जाए तो इसकी समाजी अहमियत और बढ़ जाती है।

✦ केंद्रीय विचार

इस नज़्म का मरकज़ी ख़याल बेटी को शादी के बाद की ज़िंदगी के लिए मोहब्बत, सब्र, तहम्मुल और हुस्ने-अख़लाक़ का दर्स देना है। शायर एक बाप की ज़ुबान से बेटी…

इस नज़्म का मरकज़ी ख़याल बेटी को शादी के बाद की ज़िंदगी के लिए मोहब्बत, सब्र, तहम्मुल और हुस्ने-अख़लाक़ का दर्स देना है। शायर एक बाप की ज़ुबान से बेटी को समझाता है कि नए घर में रिश्तों की क़द्र करना, बुज़ुर्गों का एहतराम करना और शोहर के साथ मोहब्बत और हमदर्दी का रिश्ता क़ायम रखना एक पुरसुकून ख़ानदानी ज़िंदगी की बुनियाद बन सकता है।

नज़्म का असल पैग़ाम यह है कि घर की ख़ूबसूरती उसकी दीवारों और सामान से नहीं, बल्कि उसमें रहने वालों के रवैयों, इख़्लास और मोहब्बत से पैदा होती है। जब घर के अफ़राद एक-दूसरे की ज़रूरतों और जज़्बात का एहतराम करते हैं तो वही घर जन्नत जैसा सुकून दे सकता है।

✦ शेर-दर-शेर व्याख्या

पहला बंद
ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
बाबा की नसीहत को हर आन निभा देना
मुश्किल अल्फ़ाज़:
ससुराल: शोहर का घर और उसका ख़ानदान।
जन्नत सा: जन्…

पहला बंद

ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
बाबा की नसीहत को हर आन निभा देना
मुश्किल अल्फ़ाज़:
ससुराल: शोहर का घर और उसका ख़ानदान।
जन्नत सा: जन्नत जैसा पुरसुकून और ख़ुशगवार।
हर आन: हर वक़्त, हमेशा।
नसीहत: ख़ैरख़्वाही पर आधारित हिदायत।
तशरीह:
इस बंद में एक बाप अपनी बेटी को रुख़्सती के मौक़े पर ज़िंदगी का एक अहम सबक़ दे रहा है। वह चाहता है कि बेटी अपने नए घर को मोहब्बत, इख़्लास, बर्दाश्त और हुस्ने-अख़लाक़ से ऐसा पुरसुकून मक़ाम बना दे जहाँ हर फ़र्द को अपनायत और एहतराम महसूस हो। बाप की नसीहत सिर्फ़ चंद अल्फ़ाज़ का मजमूआ नहीं, बल्कि उसके तजुर्बे, दुआओं और बेटी के रोशन मुस्तक़बिल की तमन्ना का निचोड़ है। इस लहजे में शफ़क़त भी है और वह फ़िक्र भी जो एक बाप को अपनी बेटी की ख़ुशियों के लिए बेचैन रखती है।
यहाँ ससुराल को जन्नत बनाने का तसव्वुर एक ऐसी घरेलू ज़िंदगी की अलामत है जहाँ रिश्ते सिर्फ़ रिवायत और रस्मों से नहीं, बल्कि दिलों के इख़्लास से क़ायम रहते हैं। लेकिन इस ख़ुशगवार माहौल की बुनियाद बाहमी मोहब्बत और घर के तमाम अफ़राद की मुश्तरका ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।
मरकज़ी मफ़हूम:
बाप अपनी बेटी को मोहब्बत, इख़्लास और हुस्ने-अख़लाक़ के ज़रिए नए घर में ख़ुशगवार माहौल पैदा करने की नसीहत करता है।

दूसरा बंद

तकलीफ़ मुसीबत को ज़ाहिर न कभी करना
जो सास ससुर बोले तो काम सभी करना
जो बात रहे दिल में वो बात बता देना
ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
मुश्किल अल्फ़ाज़:
तकलीफ़: परेशानी या अज़ीयत।
मुसीबत: मुश्किल या आज़माइश।
ज़ाहिर करना: किसी बात को सामने लाना।
सास ससुर: शोहर के वालिदैन।
दिल में बात रहना: किसी बात को अंदर ही अंदर दबाकर रखना।
तशरीह:
इस बंद में शायर ने घरेलू ज़िंदगी के उन नाज़ुक पहलुओं को बयान किया है जहाँ मुख़्तलिफ़ मिज़ाज और सोच रखने वाले लोगों को एक-दूसरे के साथ ज़िंदगी गुज़ारनी होती है। बाप अपनी बेटी को समझाता है कि मामूली बातों को अना का मसला न बनाए, घर के बुज़ुर्गों के साथ अदब-ओ-एहतराम से पेश आए और अपनी ज़िम्मेदारियों को ख़ुशदिली से पूरा करे। इस नसीहत के पीछे यह एहसास है कि नए रिश्तों को वक़्त, तवज्जो और इख़्लास की ज़रूरत होती है।
तीसरे मिसरे में शायर एक दिलचस्प और अहम पहलू सामने लाता है कि दिल में बात दबाकर रखने के बजाय उसे मुनासिब अंदाज़ में बयान कर देना बेहतर है। इससे ग़लतफ़हमियाँ कम होती हैं और रिश्तों में साफ़गोई पैदा होती है। यानी शायर की सोच में ख़ामोशी के साथ इज़हारे-ख़याल की भी अहमियत है। तकलीफ़ को ज़ाहिर न करने की बात का मतलब यह नहीं कि बेटी नाइंसाफ़ी या ज़ुल्म को छुपाती रहे, बल्कि असल समझदारी यह है कि परेशानी को मुनासिब वक़्त और हिकमत के साथ बयान किया जाए।
मरकज़ी मफ़हूम:
घरेलू ज़िंदगी में अदब, तआवुन, बर्दाश्त और साफ़गोई रिश्तों को मज़बूत बनाते हैं। दिल की बात हिकमत से कहना ग़लतफ़हमियों को दूर करता है।

तीसरा बंद

तू फ़ातिमा ज़हरा की सीरत को पढ़ा करना
शोहर की तेरे ख़िदमत बेटी तू सदा करना
जब थक के वो आए तो पैर उसके दबा देना
ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना
मुश्किल अल्फ़ाज़:
सीरत: ज़िंदगी, किरदार और अख़लाक़ का नमूना।
फ़ातिमा ज़हरा: हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा।
ख़िदमत: देखभाल, तआवुन और ख़याल रखना।
सदा: हमेशा।
थक के आना: मेहनत और मशक़्क़त के बाद घर लौटना।
तशरीह:
इस बंद में शायर अपनी नसीहत को एक रूहानी और अख़लाक़ी बुनियाद देता है। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा की सीरत का हवाला देकर बेटी को पाकीज़ा किरदार, हया, सादगी, सब्र और आला अख़लाक़ अपनाने की तरग़ीब दी गई है। शायर के नज़दीक कामयाब इज़्दवाजी ज़िंदगी की बुनियाद सिर्फ़ ज़ाहिरी आराम और आसाइश में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए मोहब्बत, इख़्लास और एहसासे-ज़िम्मेदारी में पोशीदा है।
शोहर की ख़िदमत और उसकी थकान का ख़याल रखने का ज़िक्र असल में बाहमी मोहब्बत और ख़यालदारी की एक अमली तस्वीर है। शायर ऐसे घर का तसव्वुर पेश करता है जहाँ दोनों हमसफ़र एक-दूसरे की मेहनत को समझें, एक-दूसरे का सहारा बनें और रोज़मर्रा ज़िंदगी की थकान को मोहब्बत से कम करें। इस बंद का वसीअ पैग़ाम यह है कि इज़्दवाजी रिश्ता सिर्फ़ हुक़ूक़ का नहीं, बल्कि मोहब्बत, तआवुन और एक-दूसरे की राहत का भी रिश्ता है। यह ज़िम्मेदारी दोनों हमसफ़रों पर बराबर आती है।
मरकज़ी मफ़हूम:
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा की सीरत से रहनुमाई लेते हुए शायर मोहब्बत, ख़िदमत, इख़्लास और बाहमी ख़यालदारी को कामयाब इज़्दवाजी ज़िंदगी की बुनियाद क़रार देता है।

मुकम्मल तास्सुर

यह नज़्म एक बाप के दिल से निकली हुई ऐसी नसीहत है जिसमें बेटी के लिए मोहब्बत, फ़िक्र, दुआओं और ज़िंदगी के तजुर्बात की आमेज़िश मौजूद है। शायर ने तीन बंदों में नई ज़िंदगी के तीन अहम पहलू सामने रखे हैं: पहले बंद में घर को मोहब्बत से आबाद करने की तमन्ना, दूसरे बंद में रिश्तों को निभाने की हिकमत और तीसरे बंद में सीरत-ओ-किरदार की रौशनी में इज़्दवाजी ज़िंदगी को सँवारने का पैग़ाम।
नज़्म की सबसे नुमायाँ ख़ूबी इसका इख़्लास और सादा अंदाज़े-बयान है। शायर ने पेचीदा अल्फ़ाज़ के बजाय रोज़मर्रा ज़िंदगी से जुड़ी बातों को शायरी का रूप दिया है, जिसकी वजह से पैग़ाम सीधा दिल तक पहुँचता है। इस नज़्म में एक ऐसे बाप की आवाज़ सुनाई देती है जो अपनी बेटी को सिर्फ़ नसीहत नहीं कर रहा, बल्कि उसके लिए पुरसुकून और मोहब्बत भरी ज़िंदगी की दुआ भी कर रहा है।

✦ कलात्मक ख़ूबियाँ

रदीफ़: "ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना" की तक़रार नज़्म में रब्त और मरकज़ियत पैदा करती है।
मुख़ातिबाना अंदाज़: बाप सीधे बेटी से गुफ़्त…

रदीफ़: "ससुराल को जन्नत सा बेटी तू बना देना" की तक़रार नज़्म में रब्त और मरकज़ियत पैदा करती है।
मुख़ातिबाना अंदाज़: बाप सीधे बेटी से गुफ़्तगू करता हुआ महसूस होता है।
सादगी-ए-ज़बान: आम-फ़हम अल्फ़ाज़ के ज़रिए गहरी बात कही गई है।
नसीहत आमेज़ लहजा: नज़्म में ज़िंदगी के अमली तजुर्बे और अख़लाक़ी तालीम का रंग नुमायाँ है।
जज़्बाती असर: बाप की मोहब्बत और बेटी के मुस्तक़बिल की फ़िक्र नज़्म को जज़्बाती गहराई देती है।
मौज़ूई वहदत: दोनों बंद एक ही मरकज़ी पैग़ाम के गिर्द घूमते हैं।

✦ प्रतीकवाद

इस नज़्म में "जन्नत" सुकून, मोहब्बत, अपनायत और ख़ुशगवार ज़िंदगी की अलामत है। "ससुराल" एक नए घर, नए रिश्तों और नए इम्तिहान की निशान…

इस नज़्म में "जन्नत" सुकून, मोहब्बत, अपनायत और ख़ुशगवार ज़िंदगी की अलामत है। "ससुराल" एक नए घर, नए रिश्तों और नए इम्तिहान की निशानदेही करता है। "बाबा की नसीहत" तजुर्बे, मोहब्बत और रहनुमाई की अलामत है। "फ़ातिमा ज़हरा की सीरत" पाकीज़गी, शराफ़त, सादगी और बेहतरीन अख़लाक़ का रूहानी नमूना बनकर सामने आती है।

✦ रूपक और उपमाएँ

नज़्म का सबसे नुमायाँ तशबीहाती पहलू "ससुराल को जन्नत सा बना देना" है। यहाँ ससुराल को जन्नत से तशबीह दी गई है, जो घर के सुकून, मोहब्बत और ख़ु…

नज़्म का सबसे नुमायाँ तशबीहाती पहलू "ससुराल को जन्नत सा बना देना" है। यहाँ ससुराल को जन्नत से तशबीह दी गई है, जो घर के सुकून, मोहब्बत और ख़ुशगवारी का तसव्वुर पैदा करती है।

"जन्नत" का लफ़्ज़ एक वसीअ इस्तिआराती मानी भी रखता है, जहाँ मुराद ऐसा घर है जहाँ इज़्ज़त, अमन और अपनायत हो। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा की सीरत का हवाला एक अख़लाक़ी और रूहानी मिसाल के तौर पर इस्तेमाल हुआ है।

✦ शायर के वैचारिक आयाम

मुन्तज़िम आसी की इस नज़्म में ख़ानदानी ज़िंदगी, बेटी की रुख़्सती, रिश्तों की क़द्र और अख़लाक़ी रवैये के हवाले से एक फ़िक्रमंद बाप का नज़रिया सामने आता…

मुन्तज़िम आसी की इस नज़्म में ख़ानदानी ज़िंदगी, बेटी की रुख़्सती, रिश्तों की क़द्र और अख़लाक़ी रवैये के हवाले से एक फ़िक्रमंद बाप का नज़रिया सामने आता है। शायर के नज़दीक घर की असल ख़ूबसूरती मोहब्बत, अदब, वफ़ादारी और एक-दूसरे का ख़याल रखने में पोशीदा है।

वह बेटी को सिर्फ़ घर बसाने की नसीहत नहीं करता, बल्कि उसे अच्छे किरदार और बेहतरीन अख़लाक़ की तरफ़ भी बुलाता है। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा की सीरत का हवाला इस बात को वाज़ेह करता है कि शायर अपनी फ़िक्र को दीनी और अख़लाक़ी बुनियाद पर क़ायम देखना चाहता है।

✦ आज के दौर में ग़ज़ल की प्रासंगिकता

आज के दौर में जब घरेलू ज़िंदगी में छोटी-छोटी बातें कभी-कभी बड़े इख़्तिलाफ़ात का सबब बन जाती हैं, यह नज़्म मोहब्बत, सब्र, गुफ़्तगू और एक-दूसरे के एहतरा…

आज के दौर में जब घरेलू ज़िंदगी में छोटी-छोटी बातें कभी-कभी बड़े इख़्तिलाफ़ात का सबब बन जाती हैं, यह नज़्म मोहब्बत, सब्र, गुफ़्तगू और एक-दूसरे के एहतराम की अहमियत याद दिलाती है। इसका पैग़ाम है कि रिश्तों को मज़बूत बनाने के लिए सिर्फ़ हक़ जताना काफ़ी नहीं, बल्कि दूसरों के जज़्बात को समझना और उनकी इज़्ज़त करना भी ज़रूरी है।

लेकिन जदीद दौर में इस नज़्म की मानीवियत तभी मुकम्मल होती है जब घर को जन्नत बनाने की ज़िम्मेदारी तमाम अफ़राद मिलकर उठाएँ। बेटी से मोहब्बत और ख़िदमत की उम्मीद के साथ उसकी इज़्ज़त, ख़ुशी, आराम और हुक़ूक़ का ख़याल रखना भी उतना ही ज़रूरी है। शोहर और ससुराल वालों को भी चाहिए कि वे बेटी को अपने घर का फ़र्द समझकर मोहब्बत और तहफ़्फ़ुज़ दें।

इस तरह नज़्म का पैग़ाम सिर्फ़ बेटी के लिए नसीहत नहीं रहता, बल्कि हर उस शख़्स के लिए एक अख़लाक़ी सबक़ बन जाता है जो अपने घर को मोहब्बत, इंसाफ़ और सुकून का मरकज़ बनाना चाहता है।

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✍️ मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी — संक्षिप्त परिचय

मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी
📍 मालेगाँव, महाराष्ट्र, भारत

### मुंतज़िम आसी — एक तफ़सीली अदबी तआरुफ़
मुंतज़िम आसी उर्दू अदब की दुनिया में एक ऐसे शख़्स के तौर पर सामने आते हैं जिनकी अदबी ज़िंदगी में शायरी, रूहानियत, मुतालआ, इल्म-ए-अरूज़ और अदबी ख़िदमत एक-दूसरे से जुड़ी हुई नज़र आती हैं। उनकी शख़्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने शायरी को महज़ शौक़ नहीं बल्कि एक लगातार जारी रहने वाले जुनून और ज़िम्मेदारी के तौर पर अपनाया।
उनका अदबी सफ़र किसी एक दिन …

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