اشتہار
اشتہار
اشتہار
यह साइट जनाब अकबर शेख़ साहब
अकबर शेख़
के सम्मान में बनाई गई है
📖 उनके बारे में
حمد

मुन्तज़िम आसीؔ की ख़ूबसूरत हम्द | क्या पता क्या रमूज़-ए-ख़िल्क़त है

मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी پیر، 20 اپریل 2026
👁 40 ❤️ 1
मुन्तज़िम आसीؔ की ख़ूबसूरत हम्द | क्या पता क्या रमूज़-ए-ख़िल्क़त है
क्या पता क्या रमूज़-ए-ख़िल्क़त है
तू ही जाने तेरी मशिय्यत है
चल रहा है निज़ाम-ए-दुनिया का
तेरी हिकमत है तेरी क़ुदरत है
दोनों आलम के ख़ालिक़-ओ-मालिक
एक तू ही लाइक़-ए-इबादत है
ला इलाहा के पढ़ने वालों पर
तेरी रहमत थी तेरी रहमत है
वही बनते हैं सरमद-ओ-मंसूर
"जिन को अल्लाह से मोहब्बत है"
ज़िक्र करते हैं बहर-ओ-बर तेरा
यानी हर चीज़ ज़ेर-ए-ताअत है
तू बड़ा मेहरबाँ-ओ-रहीम है तू
बख़्श देने की तेरी आदत है
हम्द लिखनी मुझे नहीं आती
जो भी लिख्खी तेरी इनायत है
📖 सार

मुन्तज़िम आसीؔ की यह हम्द अल्लाह तआला की अज़मत, उसकी क़ुदरत, हिकमत, रहमत और वाहिदानियत का ख़ूबसूरत इज़हार है। शायर कायनात के पेचीदा रमूज़ और निज़ाम-ए-दुनिया को देखकर इस नतीजे पर पहुँचता है कि तमाम मख़लूक़ात और दोनों आलम का ख़ालिक़ व मालिक सिर्फ़ अल्लाह है। दुनिया का पूरा निज़ाम उसी की हिकमत और क़ुदरत से चल रहा है और हर चीज़ उसी की इताअत में मसरूफ़ है।

हम्द में अल्लाह की रहमत और बख़्शिश के पहलू को भी ख़ास अहमियत दी गई है। शायर का कहना है कि अल्लाह की रहमत उसके बंदों पर हमेशा साया-फ़गन रहती है और बख़्श देना उसकी शान और आदत है। सरमद और मंसूर का हवाला देकर शायर ने इश्क़-ए-इलाही, वफ़ादारी और राह-ए-हक़ में साबित-क़दमी की तरफ़ भी इशारा किया है। आख़िरी शेर में शायर अपनी आजिज़ी का इज़हार करते हुए कहता है कि उसे हम्द लिखना नहीं आता, उसकी लिखी हुई हर बात भी अल्लाह की इनायत का नतीजा है। इस तरह पूरी हम्द तौहीद, तस्लीम, मोहब्बत और शुक्रगुज़ारी के जज़्बे से सराबोर है।

📚 साहित्यिक समीक्षा

अदबी लिहाज़ से यह हम्द तौहीदी फ़िक्र, सूफ़ियाना एहसास और सादा मगर पुरमानी बयानिया की अच्छी मिसाल है। शायर ने अल्लाह की सिफ़ात को बयान करने के लिए ऐसे …

अदबी लिहाज़ से यह हम्द तौहीदी फ़िक्र, सूफ़ियाना एहसास और सादा मगर पुरमानी बयानिया की अच्छी मिसाल है। शायर ने अल्लाह की सिफ़ात को बयान करने के लिए ऐसे अल्फ़ाज़ और तर्कीबात इस्तेमाल की हैं जो मज़हबी एहसास के साथ-साथ शायरी का हुस्न भी पैदा करती हैं। “रमूज़-ए-ख़िल्क़त”, “मशिय्यत”, “निज़ाम-ए-दुनिया”, “हिकमत” और “क़ुदरत” जैसी तर्कीबात हम्द के फ़िक्री दायरे को वुसअत देती हैं।

सरमद और मंसूर का हवाला कलाम में तारीख़ी और रूहानी गहराई पैदा करता है। यह हवाला इश्क़-ए-इलाही की उस कैफ़ियत की तरफ़ इशारा करता है जिसमें बंदा अपनी हस्ती से बढ़कर अपने महबूब-ए-हक़ीक़ी की मोहब्बत को अहमियत देता है। आख़िरी शेर में शायर का एतराफ़-ए-आजिज़ी पूरी हम्द को एक ख़ास रूहानी अंजाम देता है।

🖋️ आलोचनात्मक समीक्षा

तनक़ीदी नज़रिए से यह हम्द अपने मौज़ू और फ़िक्री मक़सद के ऐतबार से कामयाब है। शायर ने अल्लाह की सिफ़ात को मुख़्तलिफ़ पहलुओं से पेश किया है। कहीं कायनात…

तनक़ीदी नज़रिए से यह हम्द अपने मौज़ू और फ़िक्री मक़सद के ऐतबार से कामयाब है। शायर ने अल्लाह की सिफ़ात को मुख़्तलिफ़ पहलुओं से पेश किया है। कहीं कायनात के निज़ाम को उसकी हिकमत और क़ुदरत का नतीजा बताया गया है, तो कहीं हर मख़लूक़ के उसकी इताअत में होने का बयान है।

“ला इलाहा” पढ़ने वालों पर रहमत के ज़िक्र में तौहीद और ईमान की अहमियत सामने आती है। सरमद और मंसूर का हवाला इश्क़ की शिद्दत और राह-ए-हक़ में क़ुर्बानी की तरफ़ ध्यान दिलाता है। अलबत्ता कुछ अशआर में ख़याल की वज़ाहत और लफ़्ज़ी रब्त को और मज़बूत किया जा सकता था। इसके बावजूद कलाम का इख़लास, सादगी और रूहानी कैफ़ियत इसकी बुनियादी ख़ूबी है।

✦ केंद्रीय विचार

इस हम्द का मरकज़ी ख़याल यह है कि कायनात का हर ज़र्रा अल्लाह की क़ुदरत और हिकमत का गवाह है। दोनों आलम का ख़ालिक़ और मालिक वही है और सिर्फ़ वही इबादत के…

इस हम्द का मरकज़ी ख़याल यह है कि कायनात का हर ज़र्रा अल्लाह की क़ुदरत और हिकमत का गवाह है। दोनों आलम का ख़ालिक़ और मालिक वही है और सिर्फ़ वही इबादत के लायक़ है। उसकी रहमत तमाम मख़लूक़ात को घेरे हुए है और उसकी बख़्शिश की कोई हद नहीं। शायर इस यक़ीन के साथ अपनी आजिज़ी का इज़हार करता है कि इंसान की हर सलाहियत और हर अच्छी कोशिश उसी की इनायत से मुमकिन है।

✦ शेर-दर-शेर व्याख्या

क्या पता क्या रमूज़-ए-ख़िल्क़त है
तू ही जाने तेरी मशिय्यत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
रमूज़-ए-ख़िल्क़त: कायनात की तख़लीक़ के राज़
मशिय्यत: अल्लाह की मर्ज…

क्या पता क्या रमूज़-ए-ख़िल्क़त है
तू ही जाने तेरी मशिय्यत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
रमूज़-ए-ख़िल्क़त: कायनात की तख़लीक़ के राज़
मशिय्यत: अल्लाह की मर्ज़ी, इरादा और हिकमत
तशरीह:
इस शे'र में शायर अल्लाह तआला की अज़मत और इंसानी इल्म की महदूदियत का एतिराफ़ करता है। कायनात में बेशुमार ऐसे राज़ पोशीदा हैं जिनकी हक़ीक़त तक इंसानी अक़्ल और इल्म पूरी तरह रसाई हासिल नहीं कर सकते। इंसान अपनी तहक़ीक़ और मुशाहिदे के ज़रिए बहुत कुछ जानने की कोशिश करता है, लेकिन तख़लीक़-ए-कायनात के तमाम असरार और उनके पस-ए-पर्दा कारफ़रमा हिकमतों का हक़ीक़ी इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को है।
शायर का कहना है कि कायनात में जो कुछ हो रहा है, वह अल्लाह की मशिय्यत और उसके इरादे के मुताबिक़ है। इस शे'र में बंदे की आजिज़ी और ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी की बे-पायाँ क़ुदरत का एतिराफ़ नुमायाँ है।
मरकज़ी मफ़हूम:
कायनात के तमाम राज़ों और उसके निज़ाम की हक़ीक़ी हिकमत का इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को है। इंसान का इल्म महदूद है और अल्लाह की मशिय्यत हर चीज़ पर ग़ालिब है।
चल रहा है निज़ाम-ए-दुनिया का
तेरी हिकमत है तेरी क़ुदरत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
निज़ाम-ए-दुनिया: दुनिया का इंतिज़ाम और कायनात का पूरा निज़ाम
हिकमत: दानाई, मसलहत और बा-मक़सद तदबीर
क़ुदरत: क़ुव्वत, इख़्तियार और हर चीज़ पर क़ाबू रखने की सिफ़त
तशरीह:
इस शे'र में शायर कायनात के मुनज़्ज़म निज़ाम को अल्लाह तआला की हिकमत और क़ुदरत का मज़हर क़रार देता है। दिन और रात का आना-जाना, मौसमों की तब्दीली, ज़मीन-ओ-आसमान की गर्दिश, समुंदरों का बहाव और ज़िंदगी के बेशुमार मराहिल एक ऐसे मरबूत निज़ाम के तहत जारी हैं जिसमें नज़्म, तवाज़ुन और मक़सदियत नुमायाँ है।
शायर इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करता है कि यह सब कुछ महज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं, बल्कि ख़ालिक़-ए-कायनात की हिकमत और क़ुदरत का नतीजा है। दुनिया का हर निज़ाम उसी के हुक्म से क़ायम है और उसी की क़ुदरत से मुसलसल जारी है।
मरकज़ी मफ़हूम:
दुनिया का पूरा निज़ाम अल्लाह तआला की हिकमत, क़ुदरत और तदबीर से क़ायम है। कायनात का नज़्म उसकी बे-मिसाल क़ुदरत की गवाही देता है।
दोनों आलम के ख़ालिक़-ओ-मालिक
एक तू ही लाइक़-ए-इबादत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
दोनों आलम: दुनिया और आख़िरत, या तमाम जहान
ख़ालिक़: पैदा करने वाला
मालिक: इख़्तियार और मिल्कियत रखने वाला
लाइक़-ए-इबादत: इबादत के मुस्तहिक़
तशरीह:
इस शे'र में शायर अक़ीदा-ए-तौहीद को निहायत वाज़ेह अंदाज़ में बयान करता है। वह अल्लाह तआला को दोनों आलम का ख़ालिक़ और मालिक तस्लीम करते हुए एलान करता है कि इबादत के लाइक़ सिर्फ़ वही ज़ात है। तमाम मख़लूक़ात उसी की पैदा-कर्दा हैं और हर चीज़ उसी के इख़्तियार में है।
जब तख़लीक़, मिल्कियत और हक़ीक़ी इक़्तिदार सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए है तो बंदगी और इबादत का हक़ भी उसी को हासिल है। इस शे'र में शिर्क की नफ़ी और तौहीद-ए-ख़ालिस का पैग़ाम नुमायाँ है।
मरकज़ी मफ़हूम:
अल्लाह तआला ही तमाम जहानों का ख़ालिक़-ओ-मालिक है, इसलिए इबादत और बंदगी का हक़ीक़ी मुस्तहिक़ भी सिर्फ़ वही है।
ला इलाहा के पढ़ने वालों पर
तेरी रहमत थी तेरी रहमत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
ला इलाहा: कलिमा-ए-तौहीद का इब्तिदाई हिस्सा, यानी अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं
रहमत: मेहरबानी, शफ़क़त और करम
तशरीह:
इस शे'र में शायर कलिमा-ए-तौहीद पढ़ने वालों पर अल्लाह तआला की रहमत का ज़िक्र करता है। उसके नज़दीक अल्लाह की रहमत किसी एक ज़माने तक महदूद नहीं, बल्कि हमेशा से उसके बंदों पर साया-फ़गन रही है और आज भी जारी है।
शायर लफ़्ज़-ए-रहमत की तकरार के ज़रिए इस बात को नुमायाँ करता है कि अल्लाह तआला की मेहरबानी और करम का सिलसिला कभी मुनक़ता नहीं होता। जो लोग तौहीद का इक़रार करते और अल्लाह की बंदगी इख़्तियार करते हैं, वे उसकी रहमत और मग़फ़िरत के उम्मीदवार रहते हैं।
मरकज़ी मफ़हूम:
अल्लाह तआला की रहमत हमेशा से उसके बंदों पर जारी है। तौहीद का इक़रार करने वालों के लिए उसकी रहमत और मग़फ़िरत उम्मीद का सरचश्मा है।
वही बनते हैं सरमद-ओ-मंसूर
"जिन को अल्लाह से मोहब्बत है"
मुश्किल अल्फ़ाज़:
सरमद: सरमद शहीद की तरफ़ इशारा
मंसूर: मंसूर हल्लाज मुराद हैं
मोहब्बत: इश्क़, क़ल्बी वाबस्तगी और वारफ़्तगी
तशरीह:
इस शे'र में शायर ने सरमद और मंसूर हल्लाज का हवाला देकर इश्क़-ए-इलाही की शिद्दत और उसके लिए साबित-क़दमी के जज़्बे को बयान किया है। सरमद और मंसूर दोनों ऐसे नाम हैं जो तसव्वुफ़ की तारीख़ में इश्क़-ए-इलाही, रूहानी वाबस्तगी और अपनी राह पर क़ायम रहने के हवाले से याद किए जाते हैं।
शायर का ख़याल है कि अल्लाह से सच्ची मोहब्बत इंसान के अंदर ऐसी वारफ़्तगी और इस्तिक़ामत पैदा करती है जो उसे दुनियावी ख़ौफ़ और मसलहतों से बुलंद कर देती है। यहाँ सरमद-ओ-मंसूर का ज़िक्र महज़ तारीख़ी हवाला नहीं, बल्कि इश्क़-ए-हक़ीक़ी की इंतिहा और उसकी राह में क़ुर्बानी के जज़्बे की अलामत है।
मरकज़ी मफ़हूम:
अल्लाह से सच्ची मोहब्बत इंसान को ग़ैर-मामूली रूहानी इस्तिक़ामत अता करती है। सरमद-ओ-मंसूर इश्क़-ए-इलाही और इस राह में साबित-क़दमी की अलामत हैं।
ज़िक्र करते हैं बहर-ओ-बर तेरा
यानी हर चीज़ ज़ेर-ए-ताअत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
बहर-ओ-बर: समुंदर और ख़ुश्की, पूरी कायनात
ज़िक्र: याद, तस्बीह और हम्द
ज़ेर-ए-ताअत: हुक्म के ताबे, फ़रमाँबरदार
तशरीह:
शायर इस शे'र में अल्लाह तआला की हम्द-ओ-तस्बीह के आलमी तसव्वुर को पेश करता है। बहर-ओ-बर यानी समुंदर और ख़ुश्की की तमाम मख़लूक़ात अपने-अपने अंदाज़ में अल्लाह की तस्बीह करती हैं। कायनात की हर चीज़ उसके हुक्म और क़ानून के ताबे है।
इंसान अपनी महदूद समझ के सबब शायद हर मख़लूक़ की तस्बीह को न समझ सके, लेकिन अल्लाह तआला की तख़लीक़ में मौजूद हर शय उसकी क़ुदरत और अज़मत की गवाही देती है। शायर ने बहर-ओ-बर की तरकीब के ज़रिए पूरी कायनात को एक वसीअ मंज़र में समेट दिया है।
मरकज़ी मफ़हूम:
कायनात की हर चीज़ अल्लाह तआला के हुक्म की ताबे और अपनी हैसियत के मुताबिक़ उसकी तस्बीह-ओ-हम्द में मसरूफ़ है।
तू बड़ा मेहरबाँ-ओ-रहीम है तू
बख़्श देने की तेरी आदत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
मेहरबाँ: बहुत करम करने वाला
रहीम: निहायत रहम फ़रमाने वाला
बख़्श देना: माफ़ करना, गुनाहों से दरगुज़र करना
तशरीह:
इस शे'र में शायर अल्लाह तआला की रहमत, शफ़क़त और सिफ़त-ए-मग़फ़िरत को मौज़ू बनाता है। वह अल्लाह को निहायत मेहरबाँ और रहीम क़रार देते हुए उसकी बख़्शिश की वुसअत का ज़िक्र करता है। इंसान ख़ता का पुतला है और उससे ग़लतियाँ सरज़द होती रहती हैं, लेकिन अल्लाह तआला की रहमत उसकी लग़ज़िशों से कहीं ज़्यादा वसीअ है।
शायर का अंदाज़-ए-बयान उम्मीद और यक़ीन से भरपूर है। वह बंदे को अल्लाह की रहमत से मायूस न होने का पैग़ाम देता है। यहाँ बख़्श देने की आदत से मुराद अल्लाह तआला का मुसलसल करम और उसकी बे-पायाँ मग़फ़िरत है।
मरकज़ी मफ़हूम:
अल्लाह तआला निहायत मेहरबाँ और रहम फ़रमाने वाला है। उसकी बख़्शिश वसीअ है और बंदे को हमेशा उसकी रहमत से उम्मीद रखनी चाहिए।
हम्द लिखनी मुझे नहीं आती
जो भी लिख्खी तेरी इनायत है
मुश्किल अल्फ़ाज़:
हम्द: अल्लाह तआला की तारीफ़-ओ-तौसीफ़
इनायत: करम, मेहरबानी और अता
तशरीह:
आख़िरी शे'र में शायर अपनी आजिज़ी और इंकिसारी का इज़हार करता है। वह कहता है कि उसे अल्लाह तआला की हम्द बयान करने का हक़ अदा करना नहीं आता, क्योंकि अल्लाह की ज़ात की अज़मत और उसकी सिफ़ात इस क़दर बे-पायाँ हैं कि इंसानी अल्फ़ाज़ उनका मुकम्मल इहाता नहीं कर सकते।
शायर अपनी लिखी हुई हम्द को भी अपनी ज़ाती क़ाबिलियत का नतीजा नहीं समझता, बल्कि उसे अल्लाह तआला की अता और तौफ़ीक़ क़रार देता है। यह अंदाज़-ए-बयान बंदगी के हक़ीक़ी एहसास को ज़ाहिर करता है, जहाँ इंसान अपनी हर ख़ूबी और सलाहियत को अपने रब का एहसान समझता है।
मरकज़ी मफ़हूम:
अल्लाह तआला की अज़मत बयान करने के लिए इंसानी अल्फ़ाज़ नाकाफ़ी हैं। हम्द लिखने की तौफ़ीक़ भी उसी की अता और इनायत है।

मुकम्मल तास्सुर:

मजमूई तौर पर यह हम्द अक़ीदा-ए-तौहीद, अल्लाह तआला की क़ुदरत-ओ-हिकमत, उसकी रहमत-ओ-मग़फ़िरत और इश्क़-ए-इलाही के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को पेश करती है। शायर ने कायनात के निज़ाम से लेकर इंसानी बंदगी तक हर मौज़ू को अल्लाह की ज़ात से मुनसलिक किया है। कहीं वह तख़लीक़ के राज़ों के सामने इंसानी इल्म की महदूदियत का एतिराफ़ करता है, कहीं कायनात के नज़्म को क़ुदरत-ए-इलाही की दलील बनाता है और कहीं अल्लाह की रहमत को बंदे के लिए उम्मीद का सहारा क़रार देता है।
सरमद-ओ-मंसूर का हवाला इस हम्द में इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इस्तिक़ामत का रंग पैदा करता है, जबकि आख़िरी शे'र शायर की आजिज़ी और इख़लास को नुमायाँ करता है। इस हम्द का बुनियादी पैग़ाम यह है कि कायनात का हर ज़र्रा अल्लाह की क़ुदरत का मज़हर है, इबादत के लाइक़ सिर्फ़ वही ज़ात है और इंसान की हर नेकी, हर सलाहियत और हर अच्छी कोशिश उसी की इनायत से मुमकिन है।

✦ कलात्मक ख़ूबियाँ

इस हम्द में सादगी, रवानी, तकरार, तज़ाद और तर्कीब-साज़ी के फ़न्नी पहलू नुमायाँ हैं। “तेरी हिकमत है तेरी क़ुदरत है” और “तेरी रहमत थी तेरी रहमत है” जैसी …

इस हम्द में सादगी, रवानी, तकरार, तज़ाद और तर्कीब-साज़ी के फ़न्नी पहलू नुमायाँ हैं। “तेरी हिकमत है तेरी क़ुदरत है” और “तेरी रहमत थी तेरी रहमत है” जैसी तकरार कलाम में ज़ोर और तासीर पैदा करती है। “ख़ालिक़ व मालिक” और “बहर-ओ-बर” जैसी तर्कीबात बयान को वुसअत और ख़ूबसूरती देती हैं।

अशआर में हम्दिया लहजा शुरू से आख़िर तक क़ायम रहता है। आख़िरी शेर में शायर की आजिज़ी कलाम को फ़न्नी और जज़्बाती दोनों सतहों पर एक मुकम्मल असर अता करती है।

✦ प्रतीकवाद

इस हम्द में “रमूज़-ए-ख़िल्क़त” कायनात के उन राज़ों की अलामत है जिन्हें इंसानी अक़्ल पूरी तरह नहीं समझ सकती। “निज़ाम-ए-दुनिया” अल्लाह की तदबीर और हिकमत…

इस हम्द में “रमूज़-ए-ख़िल्क़त” कायनात के उन राज़ों की अलामत है जिन्हें इंसानी अक़्ल पूरी तरह नहीं समझ सकती। “निज़ाम-ए-दुनिया” अल्लाह की तदबीर और हिकमत का निशान है। “बहर-ओ-बर” पूरी कायनात और उसकी तमाम मख़लूक़ात की अलामत के तौर पर सामने आता है।

सरमद और मंसूर इश्क़-ए-इलाही, फ़ना-ए-नफ़्स और राह-ए-हक़ में साबित-क़दमी की अलामत हैं। इन अलामतों के ज़रिए शायर ने अपने कलाम में रूहानी गहराई पैदा की है।

✦ रूपक और उपमाएँ

इस हम्द में इस्तिआराती अंदाज़ के ज़रिए कायनात और ख़ालिक़ के रिश्ते को बयान किया गया है। “रमूज़-ए-ख़िल्क़त” में ख़िल्क़त को एक ऐसे राज़ की शक्ल में पेश…

इस हम्द में इस्तिआराती अंदाज़ के ज़रिए कायनात और ख़ालिक़ के रिश्ते को बयान किया गया है। “रमूज़-ए-ख़िल्क़त” में ख़िल्क़त को एक ऐसे राज़ की शक्ल में पेश किया गया है जिसकी हक़ीक़त का इल्म सिर्फ़ अल्लाह को है। “निज़ाम-ए-दुनिया” एक ऐसे मुनज़्ज़म सिलसिले का इस्तिआरा है जो उसकी हिकमत और क़ुदरत से क़ायम है।

“बहर-ओ-बर” में पूरी कायनात को दो बड़े मंज़रों के ज़रिए समेटा गया है। सरमद और मंसूर का हवाला इश्क़ की इंतिहाई कैफ़ियत का इस्तिआराती इज़हार है। इन तर्कीबात से हम्द में मौज़ू की गहराई और बयान की तासीर बढ़ती है।

✦ शायर के वैचारिक आयाम

मुन्तज़िम आसीؔ का फ़िक्री ज़ाविया तौहीद, तस्लीम, शुक्रगुज़ारी और इश्क़-ए-इलाही पर क़ायम है। शायर कायनात के तमाम निज़ाम को अल्लाह की मशिय्यत और हिकमत क…

मुन्तज़िम आसीؔ का फ़िक्री ज़ाविया तौहीद, तस्लीम, शुक्रगुज़ारी और इश्क़-ए-इलाही पर क़ायम है। शायर कायनात के तमाम निज़ाम को अल्लाह की मशिय्यत और हिकमत का नतीजा समझता है। उसके नज़दीक इबादत का अस्ल हक़दार सिर्फ़ अल्लाह है और हर मख़लूक़ उसी के हुक्म की पाबंद है।

कलाम में रहमत और मग़फ़िरत का तसव्वुर भी नुमायाँ है। शायर इंसान की आजिज़ी को बंदगी का अहम हिस्सा समझता है और अपनी शायरी को भी अपनी ज़ाती क़ाबिलियत के बजाय अल्लाह की इनायत से मंसूब करता है।

✦ आज के दौर में ग़ज़ल की प्रासंगिकता

आज के दौर में यह हम्द इंसान को अपनी हक़ीक़त, कायनात के निज़ाम और ख़ालिक़ से अपने रिश्ते पर ग़ौर करने की दावत देती है। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, माद्दी तरक…

आज के दौर में यह हम्द इंसान को अपनी हक़ीक़त, कायनात के निज़ाम और ख़ालिक़ से अपने रिश्ते पर ग़ौर करने की दावत देती है। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, माद्दी तरक़्क़ी और ज़ाती मसरूफ़ियात के बीच इंसान अक्सर शुक्रगुज़ारी, आजिज़ी और रूहानी सुकून से दूर हो जाता है। ऐसे माहौल में यह कलाम याद दिलाता है कि कायनात का हर ज़र्रा अल्लाह की क़ुदरत का मज़हर है।

इस हम्द का पैग़ाम है कि इंसान को अपनी क़ाबिलियत पर ग़ुरूर करने के बजाय अल्लाह की इनायत का एतराफ़ करना चाहिए। तौहीद, मोहब्बत, रहमत और शुक्रगुज़ारी जैसे जज़्बात आज भी उतने ही अहम हैं जितने हर दौर में रहे हैं।

← पिछला अगला →

✍️ मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी — संक्षिप्त परिचय

मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी
📍 मालेगाँव, महाराष्ट्र, भारत

### मुंतज़िम आसी — एक तफ़सीली अदबी तआरुफ़
मुंतज़िम आसी उर्दू अदब की दुनिया में एक ऐसे शख़्स के तौर पर सामने आते हैं जिनकी अदबी ज़िंदगी में शायरी, रूहानियत, मुतालआ, इल्म-ए-अरूज़ और अदबी ख़िदमत एक-दूसरे से जुड़ी हुई नज़र आती हैं। उनकी शख़्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने शायरी को महज़ शौक़ नहीं बल्कि एक लगातार जारी रहने वाले जुनून और ज़िम्मेदारी के तौर पर अपनाया।
उनका अदबी सफ़र किसी एक दिन …

और पढ़ें ←
حمد क्या है?

حمد اللہ تعالیٰ کی تعریف و توصیف میں لکھی جانے والی شاعری ہے۔ اردو ادب میں حمد کا ایک معزز مقام ہے۔

मोहम्मद मुनतज़िम मोहम्मद शाबान अनसारी की और रचनाएँ
سجدۂ دوام** معروف شاعر **منتظم عاصیؔ** کا ایک منفرد نعتیہ و منقبتی شعری مجموعہ ہے جس میں عشقِ الٰہی...
خود سے خود کو ہے بنایا، اے سارے جہاں کے والی، اللہ ھو خود کو تونے ہے چھپایا، اے پردہ کئے خود عالی، ا...
کبھی کبھی ایسا لگتا ہے جیسے دنیا انسانوں سے خالی ہے اور میں اکیلا تنہائی کی تلاش میں بھٹک رہا ہوں کو...
"حرفِ عظیم میم" منتظم عاصیؔ کی نعتیہ و منقبتی شاعری کا مجموعہ ہے، جس میں حضور نبی کریم ﷺ ا...
🔗 یہ بھی دیکھیں
💬 टिप्पणियाँ (0)
टिप्पणी करने के लिए लॉग इन करें

अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी करें!

साहित्यिक AI सहायक
● ऑनलाइन