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ادبِ اطفال

शेर और चूहा

علیم طاہرؔ اتوار، 17 مئی 2026
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पड़ा हुआ था ज़िद्दी चूहा यूँ ही उस के पीछे
शेर के तन पर उछल उछल कर चूहा दौड़ लगाता
लेकिन शेर के पंजे में वो जल्द ही पकड़ा जाता
शेर ने बोला छोटे चूहे तेरी इतनी जुर्रत
नींद से तू ने मुझे जगाया ऐसी तेरी हिम्मत
अब मैं तुझ को खा जाऊँगा करूँगा क़िस्सा पाक
चूहा बोला मुझ चूहे से भूख मिटेगी ख़ाक
आज मुझे जो छोड़ोगे तो कल आऊँगा काम
रहम करो जंगल के राजा और करो आराम
चूहे से यह सुन कर छोड़ा बख़्श दी इस की जान
शेर ने अपनी नींद की चादर दोबारा ली तान
उस दिन एक शिकारी आया शेर पे डाला जाल
शेर जाल में फँस कर तड़पा बुरा था उस का हाल
गया शिकारी सर्कस की इक लारी को लाने
थोड़ी देर ही गुज़री होगी बस उस को जाने
अपनी बिल से चूहा निकला देखा यह मंज़र
सब चूहों को दावत दी कि आओ सारे मिल कर
मेरा इक अहसान चुका दो आज कुतर दो जाल
जिस ने मेरी जाँ बख़्शी थी बुरा है उस का हाल
सब चूहों ने जाल को कुतरा शेर हुआ आज़ाद
रहम के बदले रहम ही पाया हुआ कहाँ बर्बाद
एक सबक़ मिलता है इस से रहम करो सब पर
रब भी हम पर रहम करेगा यक़ीं रखो रब पर
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